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#KabTakNirbhaya: महिला अपराध रोकना है तो बेटों को देने होंगे संस्कार

Mon, 02 Dec 2019 08:52 PM IST
Krishan Singh न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Mon, 02 Dec 2019 08:52 PM IST
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women's statement over hyderabad issue in amar ujala samvad at shimla and mandi
शिमला में अमर उजाला संवाद कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला

यदि महिला अपराध रोकना है तो इसकी शुरुआत घर से करनी होगी। पहले बेटों को संस्कार देने होंगे। इसके लिए जरूरी है कि जिस तरह बेटियों को समझाते हैं कि रात को बाहर नहीं जाना है, वैसे ही बेटों को भी बेटियों का सम्मान करने की बात समझानी होगी। अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में पहुंचीं शिमला शहर की प्रबुद्घ महिलाओं ने कहा कि दरिंदगी के ज्यादातर मामलों में जान पहचान के लोग शामिल होते हैं। पुलिस और शिक्षकों से जुड़े मामले भी लगातार बढ़े हैं। इससे महिलाओं में डर का माहौल है।

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तेलंगाना में जिस महिला डॉक्टर से दरिंदगी हुई, वह सशक्त महिला थी, लेकिन ट्रांसपोर्ट सुविधा न होने से यह घटना हो गई। प्रदेश में भी ट्रांसपोर्ट सिस्टम कमजोर है। राजधानी शिमला में भी रात को बसें नहीं चलतीं। महिलाएं रात को बाहर नहीं निकल सकतीं। सरकार को चाहिए कि वह ट्रांसपोर्ट सिस्टम मजबूत करें। पिंक टैक्सी चलाएं। पुलिस की तैनाती बढ़े। स्कूलों का पाठ्यक्रम ऐसा हो कि उसमें सेक्स एजूकेशन, अपराधों और इसके लिए बने कानूनों की शिक्षा दी जाए। नशे पर लगाम लगे। 

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अपराधी छोटा हो या बड़ा, सबको मिले सजा 

women's statement over hyderabad issue in amar ujala samvad at shimla and mandi

दरिंदगी का आरोपी 12 साल का है या 60 का, सबको सजा मिले। फांसी की सजा तो रखी है लेकिन चार राज्यों में ही इसे लागू किया है। ज्यादातर मामलों में जान पहचान के लोग आरोपी हैं। इन्हें कड़ी सजा मिले। पंचायतों में ज्यादातर मामले दबाव के कारण रिपोर्ट नहीं हो पाते, जो दुखद है।
किमी सूद, पार्षद बैनमोर एवं उपाध्यक्ष... संस्था

नहीं मिल रहा न्याय, जांच के लिए बने एजेंसी
फास्ट ट्रैक कोर्ट के बावजूद महिलाओं को समय पर न्याय नहीं मिल रहा। निर्भया केस को सात साल हो गए, लेकिन आरोपियों को फांसी नहीं मिली। पुलिस भी मामले टरकाती है। रेप मामलों की जांच के लिए अलग एजेंसी बने। पुलिस में 7 फीसदी महिलाएं हैं। इसे बढ़ाना होगा।
-सिमी नंदा, पार्षद एवं महासचिव यूथ कांग्रेस

निर्णय लेने वाले पदों पर हों महिलाएं

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संसद में 12 तो विस में दो से चार फीसदी ही महिलाएं हैं। पंचायतों में भागीदारी बढ़ी है लेकिन निर्णय लेने वाले पदों पर पुरुष अफसर बैठे हैं। जब तक ज्यादा महिलाएं इन पदों पर नहीं बैठेंगी, हालात नहीं बदलेंगे। कानून सख्त हैं, लेकिन इन्हें सख्ती से लागू नहीं किया जा रहा।-मीरा शर्मा, पार्षद सांगटी

बेटों को भी दें अच्छे संस्कार
महिला अपराध रोकने के लिए बेटों को संस्कार देना जरूरी है। आरोपियों को तुरंत कड़ी सजा भी मिलनी चाहिए ताकि ऐसा करने वालों में डर पैदा हो। सजा में देरी से महिला अपराध के कई मामले तो रिपोर्ट भी नहीं होते। इससे अपराध और बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर भी ऐसे मामले न आएं। -कमलेश मेहता, पार्षद, अपर ढली

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सिर्फ मोमबत्तियां जलाने से काम नहीं चलेगा

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आए दिन महिलाओं से हैवानियत की घटनाएं हो रही हैं। इसे रोकने के लिए कैंडल मार्च और मोमबत्ती जलाने भर से काम नहीं चलेगा। सिस्टम फेल हो चुका है। कहा कि जिस तरह लड़कियों को गुड टच, बेड टच सिखाते हैं, बेटों को भी वैसे संस्कार दें। सरकारें एजूकेशन सिस्टम बदलें और राजनीति बंद करें।-शैली शर्मा, पार्षद, समरहिल

घर, स्कूल में लड़कों को शिक्षित करना जरूरी
महिला अपराध रोकने के लिए मानसिकता बदलना जरूरी है। घर और स्कूल में लड़कों को भी सेक्स एजुकेशन, महिला अपराध के बारे में शिक्षित करना जरूरी है। इन्हें भी संस्कार देना जरूरी है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम और पुलिस सुरक्षा भी मजबूत हो ताकि महिलाएं शाम होते ही डरा हुआ महसूस न करें।
-प्रवीण सूद, मैट्रन दीन दयाल अस्पताल शिमला

दुष्कर्म मामले में सालों, महीनों में नहीं दिनों में मिले दोषियों को कठोर सजा

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कब तक निर्भया-अपराजिता संवाद’ मंडी - फोटो : अमर उजाला

 दुष्कर्म जैसी दरिंदगी का फैसला सालों या महीनों में नहीं, बल्कि दिनों में होना चाहिए। जिस तरह पीड़िता दरिंदगी का शिकार हुई हो, दोषियों को मौत का तरीका भी उसी तरह अदालत चुने। या फिर दोषियों को सार्वजनिक तौर पर मौत के घाट उतारा जाए ताकि किसी को भी अपनी हवस का शिकार बनाने से पहले अपराधी सौ बार सोचे। दुष्कर्म की ऐसी सजा दी जाए कि उसकी रूह भी कांप उठे।

अमर उजाला कार्यालय मंडी में सोमवार को ‘कब तक निर्भया-अपराजिता संवाद’ में हैदराबाद में हुई अमानवीय और दरिंदगी पर महिलाओं ने बेबाकी से अपने विचार रखे। इस दौरान सभी स्कूलों में सेक्स एजुकेशन शुरू करने की मांग उठी। साथ ही शिक्षकों को भी इसके लिए प्रशिक्षण का मुद्दा उठाया ताकि कल के भविष्य की सोच इन दरिंदों की तरह न हो। संवाद में स्कूलों में मानवीय मूल्यों की स्थापना और घर में लड़कों एवं लड़कियों को एक समान संस्कार और बाल्यकाल से ऐसे संवेदनशील मामलों में जागरूकता के बीज बोने का आह्वान किया गया।

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