चेतावनी: 2050 तक हिमाचल के आधे ग्लेशियर खत्म होने का खतरा, बढ़ीं बाढ़-भूस्खलन की घटनाएं
हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2050 तक लगभग आधे ग्लेशियर समाप्त होने का खतरा है। लगातार बढ़ता तापमान, सर्दियों में घटती बर्फबारी और बिगड़ता हाइड्रो-क्लाइमेट चक्र इसकी मुख्य वजहें हैं। हिमकास्टे और हिमाचल प्रदेश रिमोट सेंसिंग सेल के अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है। यदि संतुलित विकास और कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं हुआ तो ग्लेशियरों का क्षरण और तेज होगा। इसका असर हिमाचल के साथ पंजाब और हरियाणा की जल सुरक्षा पर भी पड़ेगा।
वर्ष 2014 के बाद हिमाचल के हाइड्रो-क्लाइमेट चक्र में बड़ा बदलाव: रिपोर्ट
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014 के बाद हिमाचल के हाइड्रो-क्लाइमेट चक्र में बड़ा बदलाव आया है। वर्ष 2016 और 2018 में पहाड़ों पर तापमान उच्चतम स्तर पर पहुंचा। रात में सामान्य शीतलन (कूलिंग) में कमी से ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हुई। सर्दियों में कम बर्फबारी से प्राकृतिक जल भंडारण क्षमता घट रही है। गर्मियों और मानसून में पिघला पानी एक साथ नदियों में पहुंच रहा है, जिससे बाढ़ और भूस्खलन बढ़ रहे हैं। पिछले चार वर्षों में हिमाचल को प्राकृतिक आपदाओं से करीब 46 हजार करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है। 1,700 से अधिक लोगों की जान गई है। वर्ष 2025 के मानसून में 46 फीसदी अधिक वर्षा हुई, जिसमें 366 लोगों की मौत हुई।
दो दशकों में लगभग 97.59 वर्ग किलोमीटर ग्लेशियर क्षेत्र समाप्त
सतलुज बेसिन के वर्ष 2000 से 2020 तक के सैटेलाइट आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है। वर्ष 2000 में ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल 1,481.75 वर्ग किलोमीटर था। यह 2020 तक घटकर 1,384.16 वर्ग किलोमीटर रह गया। दो दशकों में लगभग 97.59 वर्ग किलोमीटर ग्लेशियर क्षेत्र समाप्त हो गया है। बेसिन के 80 फीसदी से अधिक ग्लेशियर हर वर्ष 10 मीटर से ज्यादा पीछे खिसक रहे हैं। ग्लेशियरों का असंतुलित पिघलाव जलविद्युत परियोजनाओं के लिए भी चुनौती है। मानसून में अत्यधिक गाद आने से नाथपा-झाकड़ी और करछम-वांगतू जैसी परियोजनाओं की टरबाइनों को नुकसान होता है। बिना जलाशय वाली छोटी परियोजनाओं को बार-बार उत्पादन रोकना पड़ता है।
ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया को तुरंत रोकना संभव नहीं: वैज्ञानिक
वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया को तुरंत रोकना संभव नहीं है। हालांकि, इसकी गति को धीमा किया जा सकता है। इसके लिए कार्बन उत्सर्जन में कमी, वनों का संरक्षण और हिमालयी क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण पर नियंत्रण आवश्यक है। जलागम क्षेत्रों का संरक्षण, ग्लेशियरों और झीलों की नियमित निगरानी भी जरूरी है। समय रहते प्रभावी चेतावनी प्रणाली विकसित करना भी महत्वपूर्ण है।
इन्होंने किया अध्ययन
यह अध्ययन हिमकास्टे के स्टेट सेंटर ऑन क्लाइमेट चेंज और हिमाचल प्रदेश रिमोट सेंसिंग सेल के वैज्ञानिकों ने किया है। शोध दल में कल्पना कुमारी, नेहा ठाकुर, मोनिका चौहान, अदिति पानातू, राज कुमार और अनजान बंसल शामिल थे। अध्ययन का निर्देशन डीसी राणा और डॉ. सुरेश अत्री ने किया। अंतिम तकनीकी रिपोर्ट जनवरी 2026 में तैयार की गई है।
चार वर्षों में बन गईं 486 नई झीलें
ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का एक और गंभीर परिणाम ऊपरी क्षेत्रों में बनने वाली प्रो-ग्लेशियल झीलों की संख्या में वृद्धि के रूप में सामने आया है। वर्ष 2019 में ऐसी झीलें 562 थीं, जो 2023 तक बढ़कर 1,048 हो गईं। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि मानसून के दौरान भारी वर्षा होने पर इन झीलों के फटने (जीएलओएफ) का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, जिससे निचले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर तबाही आ सकती है।
हिमालयी ग्लेशियर केवल बर्फ के भंडार नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा और आजीविका का आधार हैं। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि जलवायु जोखिमों को विकास योजनाओं में शामिल करते हुए ग्लेशियर निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को और मजबूत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विज्ञान आधारित अनुकूलन और समय पर जलवायु कार्रवाई से भविष्य के जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।- पुष्पेंद्र राणा, निदेशक, पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग