फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Unmesh Utsav: The pain of tribal life reflected in Jugalbandi, the poets of Arunachal and Jharkhand engraved the pain with poems

Unmesh Utsav: जुगलबंदी में झलकी आदिवासी जीवन की पीड़ा, अरुणाचल और झारखंड के कवियों ने कविताओं से उकेरा दर्द

Fri, 17 Jun 2022 10:29 AM IST
Krishan Singh विश्वास भारद्वाज, शिमला
विश्वास भारद्वाज, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Fri, 17 Jun 2022 10:29 AM IST
सार

पूर्वोत्तर में हिंदी साहित्य की अलख जगा रहे तारो सिंदिक ने ‘हां मुझे हिंदी से प्रेम है, इसका मतलब ये नहीं कि मैं अपने पुरखों की भाषा पीछे छोड़ आया हूं’ और ‘उदासी में डूबा शाम का शहर’ कविताएं प्रस्तुत कीं।

विज्ञापन
Unmesh Utsav: The pain of tribal life reflected in Jugalbandi, the poets of Arunachal and Jharkhand engraved the pain with poems
जुगलबंदी में पूर्वोत्तर के युवा कवि तारो सिंदिक व अन्य - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पूर्वोत्तर के युवा कवि तारो सिंदिक ने ‘जुलूस का हिस्सा बनूं कि खड़ा रहूं हाशिये पर’ और झारखंड के अनुज लुगुन की ‘हमारे जंगल में लोहे के फूल खिले हैं’ कविताओं पर गेयटी थियेटर का टैवर्न हॉल तालियों से गूंज उठा। मौका था अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव उन्मेष का। साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त युवा कवियों ने आदिवासी जीवन की पीड़ा के सजीव चित्रण किया। पूर्वोत्तर में हिंदी साहित्य की अलख जगा रहे तारो सिंदिक ने ‘हां मुझे हिंदी से प्रेम है, इसका मतलब ये नहीं कि मैं अपने पुरखों की भाषा पीछे छोड़ आया हूं’ और ‘उदासी में डूबा शाम का शहर’ कविताएं प्रस्तुत कीं। अनुज लुगुन ने ..हमारे जंगल में लोहे के फूल खिले हैं, बॉक्साइट के गुलदस्ते सजे हैं, अभ्रक और कोयला तो थोक और खुदरा दोनों भावों से मंडियों में रोज सजाए जाते हैं’ ‘यहां खुले स्कूल, बारहखड़ी की जगह, बारहों तरीकों के गुरिल्ला युद्ध सिखाते हैं’

विज्ञापन


आदिवासी बगावत नहीं करते, हिंदी आदिवासियों की मातृभाषा नहीं है, न ही वे पत्थर फेंकने का मुहावरा जानते हैं, वे तो सिर्फ  पत्थर गाड़ना जानते हैं, फिर भी वे पत्थर फेंकने के दोषी माने जाते हैं’ कविता के जरिये अत्याचारों का उल्लेख किया। जानी मानी कवयित्री अनामिका ने ‘नमक दुख है धरती का और उसका स्वाद भी, पृथ्वी का तीन भाग नमकीन पानी है, और आदमी का दिल नमक का पहाड़’ कविता सुनाई। ‘..वो जो खड़े हैं न, सरकारी दफ्तर, शाही नमकदान हैं, पर सभागार तालियों से गूंज उठा। पंजाबी कवयित्री वनीता की पहाड़ी सड़क पर एकांत खड़ी हूं, पटियाला के दीपक धारीवाल ने मेरी आवाज दा टुकड़ा और गगनदीप शर्मा की कविताओं ने भी जमकर तालियां बटोरी। 
विज्ञापन


उगते सूरज की भूमि से : पूर्वोत्तर का साहित्य विषय पर परिचर्चा का संचालन एन किरण कुमार ने किया। अंजली बसुमतारी, अरविंदो उजिर, एसडी ढकाल और उद्दीपना गोस्वामी ने इसमें भाग लिया। मातृ भाषा का महत्व परिचर्चा की अध्यक्षता कपिल कपूर ने की। अशोक कुमार झा, भूषण भावे, जी. उमामहेश्वरराव सहित अन्य लेखकों ने इसमें भाग लिया।
विज्ञापन
विज्ञापन


चीनी घुसपैठ का डटकर जवाब देते हैं पूर्वोत्तर के लोग
अरुणाचल के तारो सिंदिक ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि अरुणाचल की सीमाएं चीन से लगती हैं, अगर हमारी शक्ल दूसरे देश के लोगों से मिलती है तो हम विदेशी नहीं हो जाते। विविधता में एकता भारत की पहचान है। अरुणाचल पर सवाल उठाए जाते हैं, लेकिन चीनी घुसपैठ होने पर पूर्वोत्तर के लोग सेना की मदद को सबसे आगे होते हैं। साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार प्राप्त कर चुके तारो इटानगर महाविद्यालय में प्राध्यापक पद पर कार्यरत हैं। कार्यक्रम में वह अपनी परंपरागत पोशाक गालुक पहन कर पहुंचे।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed