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मासूम बहनों ने बंद करवाई सदियों से चली बलि प्रथा!

Fri, 27 Jun 2014 12:33 PM IST
Updated Fri, 27 Jun 2014 12:33 PM IST
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Two sister stops Centuries old ritual sacrifice at mandi

जिला मंडी के बालीचौकी इलाके की इन दो मासूम बच्चियों की उम्र वैसे तो गुड्डे-गुड़ियों से खेलने की है, लेकिन ये देव समाज की पुरानी परंपरा को बदलने में अहम भूमिका निभाने जा रही हैं।

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सराज की दो बहनों साक्षी और अक्षि ने पंजाई के देवता पुंडरिक के कारदारों, गूर और पुजारियों को करीब दो सौ पत्र लिखकर झील के किनारे पशु बलि न देने का आग्रह किया है।
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पंजाई के देवता पुंडरिक के आषाढ़ हूम के दिन नौ बलियां दी जाती हैं। इनमें सात मेमने, दो मछलियों और केकड़े की बलि रहती है। ये बलियां देव पुंडरिक ऋषि जल सरोवर के किनारे दी जाती हैं। इस दौरान देवता का रथ झील में प्रवेश करता है।
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सरोवर से गांव को होती है पानी की सप्लाई

Two sister stops Centuries old ritual sacrifice at mandi

सरोवर के चारों कोनों में मेमने काटे जाते हैं। इससे उनका लहू सरोवर में पड़ता है। इस सरोवर से पानी की सप्लाई काउ, बडाहड, रघड और बकाहडी गांवों को जाती है। तीसरी और पहली कक्षा में पढ़ने वाली इन लड़कियों ने इस कुरीति को दूर करने के लिए देवता के गूर माघु राम के घर जाकर आग्रह किया।

देवता के गुर ने भी उन्हें सहयोग देने की बात कही है। साथ ही देव समाज से जुड़े लोगों को पत्र लिखकर उन्होंने इस प्रथा को बदलने की मांग की है। देवता पुंडरिक ऋषि के प्रधान दौलत राम ने कहा कि उन्हें पत्र नहीं मिला है, लेकिन लोग इस प्रथा के बारे में मंथन कर रहे हैं।

मेमनों को तालाब से दूर काटने पर बहुमत बन रहा है। इस बात को जनता के बीच रखेंगे। लोगों को पीने का साफ पानी मिलना चाहिए। देवता के महासचिव मान सिंह ने कहा कि उन्हें साक्षी और अक्षि से पत्र मिला है। पत्र की बात देवता की बैठक में रखी जाएगी।

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