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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Shimla News ›   turpentine oil extracted from pine

अब चीड़ की छाल उतारे बगैर मिलेगा आला दर्जे का तारपीन

Fri, 22 Dec 2017 11:13 AM IST
राकेश शर्मा/अमर उजाला, सोलन
राकेश शर्मा/अमर उजाला, सोलन Updated Fri, 22 Dec 2017 11:13 AM IST
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turpentine oil extracted from pine

अब चीड़ के पेड़ों की छाल उतारे बगैर आला दर्जे का तारपीन हासिल किया जाएगा।  इससे न तो पेड़ पर कोई असर पड़ेगा और न ही तारपीन हासिल करने के लिए लंबी अवधि तक इंतजार की जरूरत रहेगी। बढ़िया किस्म का तारपीन हासिल कर बाजार में अच्छा-खासा मुनाफा भी कमाया जा सकता है। इस विधि के उपयोग से चीड़ के पेड़ों को संरक्षण भी मिलेगा। 

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गौरतलब है कि चंबा, कांगड़ा, हमीरपुर, मंडी व बिलासपुर सहित अन्य जगहों पर चीड़ के घने जंगल मौजूद हैं। जिन्हें तारपीन के लिए लगाया गया था। लेकिन तरीका सही न होने की वजह से इन पेड़ों से उच्च गुणवत्ता का तारपीन हासिल नहीं हो पाया। इसका असर पेड़ों की पैदावार पर भी पड़ा है और अब चीड़ के यह जंगल सिर्फ सूखे मौसम में आग लगने के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं। लेकिन नौणी विवि की नई खोज के बाद इन पेड़ों की अहमियत बढ़ जाएगी। 
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डॉ. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हार्टीकल्चर एंड वानिकी नौणी में यह नई तकनीक तैयार की गई है, जिसे बोरहोल का नाम दिया गया है। नई विधि में ड्रिलिंग के छोटे छेद (1 इंच चौड़े और 4 इंच गहरे) शामिल हैं, जिससे इसकी रेजिन नलिकाओं को खोलने के लिए पेड़ में सरल औजारों का प्रयोग किया जाता है। छेद को खोलने की ओर थोड़ी ढलान के साथ ड्रिल किया जाता है। रेजिन कलेक्शन के लिए टाई की सहायता से स्पॉड्स को पालीथिन बैग के साथ खोलने में लगाया जाता है।
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यूएचएफ विभाग के वन उत्पाद के प्रमुख डॉ कुलवंत राय ने बताया कि नई तकनीक को अन्य परंपरागत तरीकों की कुछ सीमाओं पर काबू पाने के प्रयास में विकसित किया गया था। इस विधि का एक प्रमुख विशेषता यह है कि एक बंद संग्रहण तंत्र रेजिन एसिड के समय से पहले मजबूती को रोकता है। इससे छह महीने तक की विस्तारित अवधि के लिए ओलेरेसिन प्रवाह को बनाए रखता है।

एक पेड़ से इतना निकलता है तारपीन

turpentine oil extracted from pine

विधि के क्षेत्र परीक्षणों ने पाया है कि पाइन में ओलेरेसिन की पैदावार औसतन 600-900 ग्राम प्रति बोरहोल या तीन वृक्षों के साथ प्रति पेड़ लगभग दो किलोग्राम होती है।

पेड़ की अधिकतम क्षमता के अनुसार पेड़ पर बोरहोल की संख्या समायोजित की जाती है, तो पेड़ की औसत उपज लगभग एक ही है। इस विधि से स्वास्थ्य पर कोई असर न होने के कारण उत्पादन की क्षमता के आधार पर निम्न व्यास के वृक्षों के दोहन की अनुमति है। 
बोरहोल के तारपीन में उच्च गुणवत्ता
नौणी विवि के वीसी डॉ. एचसी शर्मा ने कहा कि बोरहोल विधि से प्राप्त तारपीन तेल में बहुत अच्छी गुणवत्ता मिलती है। इसकी लागत पारंपरिक तरीकों से काफी कम है।

बोरहोल घाव पेड़ों की छाल को बहुत कम नुकसान पहुंचाते हैं। यह तकनीक भारत में पाइन संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन में बहुत प्रभावी साबित हो सकती है।

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