मंडी हादसाः दो और छात्रों के शव निकाले गए
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ब्यास नदी में बहे हैदराबाद के इंजीनियरिंग छात्रों की तलाश में जुटे बचाव दलों को वीरवार सुबह सवा 11 बजे तक दो और छात्रों के शव मिले हैं। इन शवों को भी नदी में पत्थरों के नीचे से बरामद किया गया है।
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इनकी शिनाख्त भी कर ली गई है। इनमें एक शव टी उपेंद्र और दूसरा अरविंद कुमार का है। इन्हें सड़क तक पहुंचाया जा रहा है। दोनों शव काफी क्षत विक्षत भी हो चुके हैं। सर्च ऑपरेशन में जुटे जवान लगातार नदी के किनारों पर खोजबीन जारी रखे हुए हैं।
अब तक आठ शव ब्यास से बरामद हो चुके हैं। लेकिन अभी भी 16 छात्रों का कोई पता नहीं है। इनकी तलाश जारी है।
नेवी के गोताखोर भी पहुंचे
प्रदेश सरकार के केंद्र से मदद मांगने के बाद नौ सेना के प्रशिक्षित गोताखोरों की आठ सदस्यीय टीम भी मंडी पहुंच गई है। ये टीम जल्द ही ब्यास में सर्च अभियान की शुरुआत करेगी। इनके अलावा राष्ट्रीय आपदा प्राधिकरण के वाइस चेयरमैन शशिधर रेड्डी और एनडीआरएफ के डीजी भी मौके पर पहुंच गए हैं।
साथ ही अंडर वाटर कैमरे की भी मदद लेना शुरू कर दिया गया है। सर्च ऑपरेशन में ज्यादा कामयाबी न मिलने के बाद प्रदेश सरकार ने केंद्र से नौसेना की मदद मांगी थी। बचाव दलों में आईटीबीपी, एसएसबी, एनडीआरएफ समेत 550 से ज्यादा जवान जुटे हुए हैं।
अंदेशा जताया जा रहा है कि ज्यादातर शव पत्थरों और सिल्ट के नीचे दबे हैं, इसीलिए इन्हें ढूंढने में देरी हो रही है। सरकार के निर्देशों के बाद लारजी प्रोजेक्ट से पानी का बहाव भी कम कर दिया गया है।
उत्पादन न घटाते तो न खोलने पड़ते डैम के गेट
हैदराबाद से घूमने मनाली जा रहे इंजीनियरिंग छात्रों ने नार्थ ग्रिड को फेल होने से बचाने की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। यदि लारजी प्रोजेक्ट के विद्युत उत्पादन को 138 मेगावाट से घटाकर 32 मेगावाट पर नहीं लाया जाता, तो डैम के गेट खोलने की जरूरत नहीं पड़ती और 25 जानें भी बच जातीं।
रीजनल लोड डिस्पैच सेंटर से आए संदेश के आधार पर स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर ने ग्रिड में बिजली की मांग न होने के कारण लारजी में विद्युत उत्पादन घटाने को कहा, क्योंकि नार्थ ग्रिड में लोड ज्यादा हो गया था।
रविवार शाम को लारजी परियोजना के प्रबंधन को मैसेज मिला कि उत्तरी ग्रिड को बिजली की कम सप्लाई दें। नहीं तो ज्यादा लोड होने के कारण उत्तरी ग्रिड फेल हो सकता।
बिजली सप्लाई कम करने के मिले थे निर्देश
प्रोजेक्ट प्रबंधन को रविवार को 5.30 से 7.30 बजे तक बिजली की सप्लाई कम करने के लिए कहा गया। इसी कारण डैम को बचाने के लिए प्रोजेक्ट प्रबंधन को पानी छोड़ा और हादसा पेश आया। लारजी परियोजना के चीफ इंजीनियर प्रेम लाल मासूम ने बताया कि लोड डिस्पैच सेंटर शिमला से जनरेशन कम करने का आदेश के अनुसार रविवार को लारजी प्रोजेक्ट को शाम साढ़े पांच बजे 138 मेगावाट से 96 मेगावाट विद्युत जनरेशन करने कहा गया था।
5.55 पर उत्पादन 96 मेगावाट से 64 मेगावाट किया गया। इस उत्पादन को कम करने के लिए शाम 6.15 पर बजे 50 सेंटीमीटर गेट खेल कर पानी छोड़ा। 6.40 पर उत्पादन को 32 मेगावाट पर लाया गया।
शाम 7.10 पर बजे व्यास नदी में हैदराबाद से आए छात्रों के बह जाने का पता लगने पर एसएलडीसी से पावर जनरेशन के आदेश लेकर पानी को पावर हाउस से निकाला गया तथा 138 मेगावाट जनरेशन की गई। लेकिन सवाल ये है कि केवल बिजली बोर्ड के प्रोजेक्टों में ही कटौती क्यों की गई?
हादसे ने खोला प्रोजेक्ट का बड़ा गड़बड़झाला
वहीं, लारजी हादसे ने किसी बड़े गड़बड़झाले की ओर भी इशारा किया है। रविवार को जिस समय ग्रिड को बचाने के नाम पर लारजी के टरबाइन बंद करवाए गए, उसी दौरान हिमाचल में स्वतंत्र विद्युत उत्पादकों के प्राइवेट प्रोजेक्ट क्षमता से अधिक बिजली बनाते रहे।
ऐसे में रीजनल लोड डिस्पैच सेंटर और स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर यदि सभी प्रोजेक्टों में विद्युत उत्पादन समान रूप से या प्रो-रेटा आधार पर घटाता तो अकेले लारजी पर दबाव न बनता और 25 जानें भी कुर्बान होने से बच जातीं। जिस समय लारजी के टरबाइन बंद करवाए गए, उसी अवधि में 1000 मेगावाट के जेपी कंपनी के कड़छम वांगतू प्रोजेक्ट ने 1187 मेगावाट, एनजेवीएन के नाथपा झाकड़ी प्रोजेक्ट ने 1500 मेगावाट के बजाए 1602 मेगावाट, एवरेस्ट पावर कंपनी के मलाणा-2 प्रोजेक्ट ने 100 की जगह 105 मेगावाट बिजली पैदा की।