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ऐसे तो मिट जाएगा सतलुज नदी का अस्तित्व!

Tue, 01 Apr 2014 12:18 PM IST
Updated Tue, 01 Apr 2014 12:18 PM IST
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The existence of the Sutlej river under theart

ताबड़तोड़ बनाए जा रहे हाइड्रो प्रोजेक्टों से सतलुज नदी का अस्तित्व खतरे में है। कई जगह नदी सूख गई है, जिससे जलीय जीव भी खत्म होने लगे हैं।

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देहरादून स्थित भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई), आईआईटी रुड़की, कोल्डवाटर फिशरीज रिसर्च भीमताल की ओर से किए गए संयुक्त अध्ययन में यह चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
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जनवरी के शुरू में प्राथमिक रिपोर्ट पर्यावरण एवं विज्ञान तकनीकी विभाग को सौंपी गई थी। लगभग 400 पेज की फाइनल रिपोर्ट अप्रैल 2014 में आने की संभावना है।

अध्ययन में सामने आए हैं कई तथ्य

The existence of the Sutlej river under theart

सतलुज पर बने 38 हाइड्रो प्रोजेक्टों से किस प्रकार पर्यावरण को क्षति हो रही है। किस तरह से जैव विविधता को नुकसान हो रहा है।

पर्यावरण एवं विज्ञान तकनीकी विभाग की ओर से इसका अध्ययन कराया गया है। अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि उक्त नदी पर जितने भी हाइड्रो प्रोजेक्ट बने हैं।

इनमें से किसी के द्वारा उचित मात्रा में नदी में पानी नहीं छोड़ा जा रहा है। इससे कई जगह नदी सूख गई है। मछली सहित अन्य जलीय जीव नष्ट हो रहे हैं।

टनल से जो पानी छोड़ा जा रहा है। उसे भी डायवर्ट करके छोड़ा जा रहा है। इतना ही नहीं, हाइड्रो प्रोजेक्ट बनाने को जो मानक ध्यान में रखे जाने चाहिए थे, उन्हें ताक पर रखा गया।

सड़क निर्माण के दौरान मलबा नदी में गिराया जा रहा है। पौधे लगाने में भी कोताही बरती जा रही है।

चिनाब, रावी और व्यास की भी होगी स्टडी

The existence of the Sutlej river under theart

चिनाब, रावी और व्यास नदियों में बड़े पैमाने पर हाइड्रो प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं। इन पर बनने वाले हाइड्रो प्रोजेक्ट से किस प्रकार पर्यावरण को क्षति होगी।

इसका भी अध्ययन कराया जाएगा। इसको लेकर भी ऊर्जा विभाग की ओर से अलग-अलग एजेंसियां नामित की गई हैं।

इसको लेकर अभी अध्ययन शुरू होना है। रिपोर्ट आने के बाद ऊर्जा विभाग को कहा गया है कि प्रत्येक हाइड्रो प्रोजेक्ट अपने स्तर पर 15 फीसदी पानी नदी में छोड़ें।

पर्यावरण एवं विज्ञान तकनीकी विभाग के निदेशक एसएस नेगी का कहना है कि इसकी नियमित मॉनीटरिंग करने को भी कहा गया है, जिससे नदी का अस्तित्व बचाया जा सके।

वहीं, आईसीएफआरई के वैज्ञानिक डॉ. सुधीर का कहना है कि प्राथमिक रिपोर्ट सौंप दी गई थी। फाइनल रिपोर्ट एक माह के भीतर दी जाएगी।

रिपोर्ट में खास यह है कि पर्यावरण संतुलित रखने को जो प्रबंधन होए था, वो मौके पर नहीं किया गया। इससे काफी नुकसान हुआ है।

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