देश भर के सबसे बड़े टमाटर उत्पादकों की दुर्दशा, लाल सोने ने डुबोया
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देश भर के सबसे बड़े सोलन के टमाटर उत्पादकों की इस बार दुर्दशा हो गई। डेढ़ अरब रुपये तक की पैदावार से देशभर की मंडियों में खलबली मचाने वाले हिमाचल के लाल सोने के रंग को कर्नाटक के टमाटर ने फीका कर दिया।
मंडियों में कर्नाटक के टमाटर की आवक बढ़ने से हिमाचल के किसानों को भारी घाटा उठाना पड़ा है। हालात ऐसे हैं कि सीजन खत्म होने से पूर्व ही किसानों ने खेतों से टमाटर के पौधे उखाड़ने शुरू कर दिए हैं। अब तक हुए कारोबार में टमाटर की बिक्री में रिकॉर्ड 53 करोड़ 69 लाख रुपये का घाटा हो चुका है।
किसानों ने टमाटर पर बीज, स्प्रे और मजदूरों पर मोटी रकम खर्च की थी। अब उनके यह पैसे भी पूरे होते नजर नहीं आ रहे हैं। पिछले साल सितंबर तक टमाटर का कुल कारोबार आठ लाख चार हजार 385 क्रेट का था। उस दौरान टमाटर का औसतन मूल्य 900 रुपये प्रति क्रेट था।
ऐसे में सितंबर के शुरुआती हफ्तों में किसानों ने सोलन सब्जी मंडी के माध्यम से 72 करोड़ 39 लाख 46 हजार रुपये का कारोबार कर लिया था। उस बंपर सीजन के मुकाबले इस बार अब तक 6 लाख 23 हजार 335 क्रेट सब्जी मंडी से बाहर जा पाए हैं। औसतन मूल्य भी 300 रुपये प्रति क्रेट मिल पाया है।
इस वजह से हुअा नुकसान
ऐसे में अब तक का कारोबार 18 करोड़ 500 रुपये बनता है। पिछले साल टमाटर का परचून मूल्य सौ रुपये तक गया था। निचले क्षेत्रों में हिमाचल के टमाटर की भरपूर मांग थी, लेकिन इस बार कर्नाटक के टमाटर ने दिल्ली समेत उत्तर भारत की कई बड़ी मंडियों पर अपनी धाक जमा ली।
सोलन सब्जी मंडी के सचिव प्रकाश कश्यप का कहना है कि कर्नाटक के टमाटर ने हिमाचल की बिक्री पर असर डाला है। जो व्यापारी हिमाचल पर निर्भर थे, अब कर्नाटक की तरफ रुख कर रहे हैं।
इस बार सौ रुपये किलोग्राम के हिसाब से भी क्रेट भेजने पड़ रहे हैं। पिछले साल 1200 से 1400 रुपये तक क्रेट का अधिकतम दाम रहा था। भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश मीडिया प्रभारी देवेंद्र ठाकुर ने बताया कि किसान एक ही फसल पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
इससे नुकसान हुआ है। पिछले साल टमाटर अच्छा था तो इस साल शिमला मिर्च और अदरक के दाम अच्छे मिले हैं, लेकिन ज्यादातर किसानों ने शिमला मिर्च और अदरक की खेती ही नहीं की। किसानों को फसल बदल-बदल कर खेतीबाड़ी करनी चाहिए।