अनूठी परंपरा: यहां के गावों में सिगरेट पीना तो दूर, छूने की भी है मनाही
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देवी-देवताओं की धरा हिमाचल की एक दर्जन पंचायतें ऐसी हैं, जहां सिगरेट पीना तो दूर इसे छूने की भी मनाही है। कुल्लू जिले की लगघाटी के ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। देव आदेश के चलते घाटी की एक दर्जन पंचायतों में बीड़ी-सिगरेट का प्रवेश निषेध है।
यहां के बाशिंदे तंबाकू और गुटका आदि का सेवन भी नहीं करते। माना जाता है कि बीड़ी और सिगरेट पीने और पिलाने वालों को देव प्रकोप झेलना पड़ता है। भल्याणी गांव के भगवान श्रीकृष्ण के कारदार रूम सिंह नेगी की मानें तो यहां के लोग देव आस्था रखते हैं।
देवता ने सदियों से बीड़ी-सिगरेट के सेवन पर प्रतिबंध लगाया है। ग्रामीण बस्तियों में इनके प्रवेश पर भी मनाही है। देव आस्था के चलते लोग इनका सेवन भी नहीं करते। लगघाटी के भल्याणी, जठाणी, खारका, तिउन, भुट्ठी, समालंग, कालंग और शालंग सहित दर्जनों गांवों में धूम्रपान के सेवन और प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध है।
मदिरापान पर नहीं मनाही
जठाणी निवासी जगदीश ठाकुर, भल्याणी निवासी किरपा राम बताते हैं कि लगघाटी के अधिकांश गांवों में धूम्रपान निषेध है। गांव में इसका प्रवेश भी वर्जित है। देव आस्था के चलते लोग इसके सेवन से कतराते हैं।
देव कारदार रूम सिंह ने कहा कि भले ही सरकार देश की जनता को धूम्रपान के छोड़ने के लिए आज करोड़ों रुपये खर्च कर जागरूक कर रही है, लेकिन यहां के बाशिंदे सदियों से बीड़ी-सिगरेट, तंबाकू और गुटका का सेवन नहीं करते।
लगघाटी में बीड़ी-सिगरेट के सेवन पर तो मनाही है, लेकिन मदिरापान के सेवन पर देवता की ओर से कोई रोक नहीं है। घाटी के पारंपरिक मेलों और त्योहारों में मेहमानों को मदिरा परोसी जाती है। अनाज से तैयार होने वाली सुरा को खास मौकों पर देवता को चढ़ाया जाता है।
चोरी-छिपे बाउंड्री के बाहर लगते हैं कश
बेशक, लगघाटी की 12 पंचायतों में बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू और गुटका के सेवन पर देवता आदेश लागू होते हैं, लेकिन चोरी-छिपे गांव की बाउंड्री के बाहर अकसर युवा कश लगाते दिखते हैं। हालांकि, युवा पीढ़ी घाटी के रीति-रिवाजों से भली-भांति परिचित है।