{"_id":"5b79554642c792465a6a47aa","slug":"satinder-jeet-rank-2nd-in-naib-tehsildar-hppsc-exam","type":"story","status":"publish","title_hn":"बेटी की मौत का गम भी नहीं डगमगा पाया सतिंद्र के कदम, बने नायब तहसीलदार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बेटी की मौत का गम भी नहीं डगमगा पाया सतिंद्र के कदम, बने नायब तहसीलदार
वेद प्रकाश ठाकुर, अमर उजाला, राजगढ़ (सिरमौर)
Updated Mon, 20 Aug 2018 12:26 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एक तरफ बेटी की मौत का सदमा और दूसरी तरफ बुलंदियां छूने का लक्ष्य। ऐसी परिस्थितियों में अक्सर व्यक्ति अपना लक्ष्य भूल जाता है। लेकिन, यहां स्थिति इसके उलट है। दृढ़ संकल्प, कड़े परिश्रम और इच्छा शक्ति के बूते एक व्यक्ति ने अपने परिवार की विपरीत परिस्थितियों को भी घुटने नहीं टेके।
विज्ञापन
राजगढ़ के 41 वर्षीय सतिंद्र जीत ने निराशा को भुलाकर आशा का दामन नहीं छोड़ा। पेशे से टीजीटी नॉन मेडिकल के रूप में सेवाएं दे रहे सतिंद्र जीत ने प्रदेश लोक सेवा आयोग की नायब तहसीलदार परीक्षा में राज्य में दूसरे स्थान हासिल किया है।
विज्ञापन
उम्र की सीमा को भी अपने लक्ष्य में आड़े नहीं आने दिया। सतिंद्र जीत इससे पहले भी दो बार एचएएस की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा पास कर चुके हैं, लेकिन दोनों ही बार रिजेक्ट कर दिए गए। सतिंद्र को इसका मलाल नहीं है।
विज्ञापन
अभी भी वह अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं। सतिंद्र जीत ने प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षा वर्ष 2009 से देनी शुरू की थी। इसी वर्ष उनकी माता की आकस्मिक मृत्यु हो गई। 2011 में उनके घर कन्या पैदा हुई, लेकिन वह जन्म से ही हृदय रोग से पीड़ित रही।
बच्ची की ओपन हार्ट सर्जरी करवानी पड़ी। लेकिन, उनकी बेटी की मई 2017 में मृत्यु हो गई। सतिंद्र अपने माता-पिता को प्रेरणास्रोत मानते हैं, वहीं अपनी पत्नी के योगदान को भी अहम स्थान देते हैं। सतिंद्र का कहना है कि परिवार के सहयोग के बिना यह संभव नहीं होता।