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भ्रष्टाचार के मामले में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर कोर्ट से बाइज्जत बरी

Mon, 12 Dec 2016 12:05 AM IST
सतीश वालिया/अमर उजाला, धर्मशाला
सतीश वालिया/अमर उजाला, धर्मशाला Updated Mon, 12 Dec 2016 12:05 AM IST
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PWD Executive Engineer acquitted in Corruption Case

विशेष न्यायाधीश (फॉरेस्ट) शिमला की अदालत ने तत्कालीन लोनिवि के अधिशासी अभियंता (विद्युत) शिमला पंकज कपूर पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त कर दिया है। एक्सईएन कपूर के खिलाफ विजिलेंस विभाग शिमला ने 1 जुलाई, 2011 में भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया था। इसके बाद मामला कोर्ट में चला।

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अब अदालत ने कपूर को तमाम आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया है। मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता अजय कौछड़ ने बताया कि अदालत में ठेकेदार के आरोप द्वेषपूर्ण और दुर्भावना से ग्रस्त पाए गए। मामले के अनुसार लोनिवि शिमला ने जून 2011 में सरकारी ठेकेदार पूर्ण चंद भारद्वाज को टीबी अस्पताल धर्मपुर में डीजी सेट लगाने का कार्य आठ लाख 41 हजार रुपये में अवार्ड किया था।
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विभाग ने नियमानुसार कार्य पूरा होने के बाद बिल का भुगतान चेक के माध्यम से ठेकेदार के बैंक खाते में किया था। इसके बाद ठेकेदार ने कपूर पर कमीशन की डिमांड करने का आरोप लगाया था। न्यायालय में चली कार्रवाई में पाया गया कि कार्य समाप्ति के बाद फाइनल बिल की पेमेंट 29 जून, 2011 को चेक से की गई थी। ठेकेदार की कोई भी बकाया राशि देय नहीं थी। 

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शिकायतकर्ता ने माना नहीं की थी कमीशन की डिमांड

PWD Executive Engineer acquitted in Corruption Case

ठेकेदार के शिकायत पत्र, अदालत में दिए बयान और साक्ष्य विरोधाभ्यास से भरे दिखे। यह सब भ्रमित तथ्यों पर आधारित होने की वजह से शिकायत की पुष्टि नहीं कर पाए। शिकायतकर्ता ने स्वयं अदालत में माना कि अधिशासी अभियंता कपूर की ओर से न तो किसी तरह की कमीशन की डिमांड थी और न ही कार्य? 

इस तरह ट्रैप की वैद्यता, औचित्य और आवश्यकता को उच्चतम और विभिन्न उच्च न्यायालयों के समय-समय पर दिए निर्देशों के अनुरूप न मानते हुए गैर कानूनी पाया। इससे पहले कोर्ट ट्रायल के दौरान सामने आया कि मार्च 2016 को जब केस की सुनवाई अंतिम चरण में थी तो शिकायतकर्ता ने मामले को लटकाने की मंशा से उच्च न्यायालय में अर्जी लगाकर कार्रवाई को स्थगित करवा

दिया। उच्च न्यायालय में तथ्यों की पड़ताल के उपरांत उनके आदेश से इस आवेदन की सुनवाई हुई। आवेदन पर सुनवाई के बाद अदालत ने अर्जी में उठाई आपत्तियों को निराधार और भ्रमित करने वाली पाया। 22 सितंबर, 2016 के आदेश पर शिकायतकर्ता को जुर्माना भी किया।

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