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Shimla News: पक्षकारों को शामिल न करने पर संपत्ति विवाद का मामला खारिज
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सिविल जज मन्नू प्रिंजा की अदालत का फैसला
जमीन से जुड़ा है मामला, बेटियां नहीं बनाई थीं पक्षकार
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। सिविल जज मन्नू प्रिंजा की अदालत ने भूमि विवाद और वसीयत की वैधता से जुड़े 13 साल पुराने दीवानी मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए वाद (मुकदमा) खारिज कर दिया है।
अदालत ने माना कि मृतक के सभी जरूरी वारिसों को पक्षकार बनाए बिना ऐसे मामले का निपटारा कानूनन संभव नहीं है। मामला शिमला ग्रामीण तहसील में स्थित पैतृक संपत्ति से जुड़ा है। वादी धनी राम और अन्य (दिवंगत रूप लाल के कानूनी वारिसों) ने वर्ष 2013 में अदालत में वाद दायर किया था। उन्होंने अपने दादा स्व. राम सरन की ओर से 9 जून 2000 को रंजीत सिंह और पूरन सिंह (प्रतिवादी) के पक्ष में निष्पादित पंजीकृत वसीयत को अवैध, फर्जी और शून्य घोषित करने की मांग की थी। वादियों का तर्क था कि विवादित संपत्ति पैतृक है और वसीयत धोखाधड़ी तथा बहकावे में आकर लिखवाई थी। इसके साथ ही उन्होंने वसीयत के आधार पर वर्ष 2006 में दर्ज इंतकाल को रद्द करने और संपत्ति में अपना एक-चौथाई हिस्सा दिए जाने की मांग की थी।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बेटियां भी वारिस होती हैं। वसीयत को रद्द किया जाता है या बरकरार रखा जाता है, दोनों ही स्थितियों में बेटियों के संपत्ति संबंधी अधिकार सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं। इसके बावजूद वादियों ने सभी बेटियों को मामले में पक्षकार नहीं बनाया था। अदालत ने आवश्यक पक्षकारों को शामिल न किए जाने के आधार पर वाद को खारिज कर दिया। संवाद
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जमीन से जुड़ा है मामला, बेटियां नहीं बनाई थीं पक्षकार
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। सिविल जज मन्नू प्रिंजा की अदालत ने भूमि विवाद और वसीयत की वैधता से जुड़े 13 साल पुराने दीवानी मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए वाद (मुकदमा) खारिज कर दिया है।
अदालत ने माना कि मृतक के सभी जरूरी वारिसों को पक्षकार बनाए बिना ऐसे मामले का निपटारा कानूनन संभव नहीं है। मामला शिमला ग्रामीण तहसील में स्थित पैतृक संपत्ति से जुड़ा है। वादी धनी राम और अन्य (दिवंगत रूप लाल के कानूनी वारिसों) ने वर्ष 2013 में अदालत में वाद दायर किया था। उन्होंने अपने दादा स्व. राम सरन की ओर से 9 जून 2000 को रंजीत सिंह और पूरन सिंह (प्रतिवादी) के पक्ष में निष्पादित पंजीकृत वसीयत को अवैध, फर्जी और शून्य घोषित करने की मांग की थी। वादियों का तर्क था कि विवादित संपत्ति पैतृक है और वसीयत धोखाधड़ी तथा बहकावे में आकर लिखवाई थी। इसके साथ ही उन्होंने वसीयत के आधार पर वर्ष 2006 में दर्ज इंतकाल को रद्द करने और संपत्ति में अपना एक-चौथाई हिस्सा दिए जाने की मांग की थी।
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अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बेटियां भी वारिस होती हैं। वसीयत को रद्द किया जाता है या बरकरार रखा जाता है, दोनों ही स्थितियों में बेटियों के संपत्ति संबंधी अधिकार सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं। इसके बावजूद वादियों ने सभी बेटियों को मामले में पक्षकार नहीं बनाया था। अदालत ने आवश्यक पक्षकारों को शामिल न किए जाने के आधार पर वाद को खारिज कर दिया। संवाद
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