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Shimla News: बालूगंज गोपाल मंदिर की कार्यकारिणी की कमान अब महिलाओं के हाथ

Fri, 28 Aug 2026 11:59 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Fri, 28 Aug 2026 11:59 PM IST
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Baluganj Gopal Mandir's executive committee is now in the hands of women.
पूरी कार्यकारिणी में महिलाओं के निर्विरोध चुने जाने वाला पहला मंदिर बना गोपाल मंदिर, उषा खांसली अध्यक्ष नियुक्त
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लता शांडिल और पूजा सूद को उपाध्यक्ष की जिम्मेवारी
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। प्रदेश के कई मंदिरों में जहां महिलाओं के प्रवेश को लेकर अब भी पाबंदियां हैं, वहीं राजधानी के बालूगंज स्थित गोपाल मंदिर ने मंदिर प्रबंधन की कमान महिलाओं को सौंपकर मिसाल पेश की है।
गोपाल मंदिर सभा बालूगंज की नई कार्यकारिणी का चुनाव शुक्रवार को हुआ। खास बात यह है कि चुनाव में कार्यकारिणी के सभी सदस्यों का चयन निर्विरोध हुआ। दावा किया जा रहा है कि यह शहर का पहला ऐसा मंदिर है, जिसकी पूरी कार्यकारिणी में केवल महिलाएं शामिल हैं। नवनियुक्त कार्यकारिणी में उषा खांसली को अध्यक्ष चुना गया है। लता शांडिल और पूजा सूद को उपाध्यक्ष, नम्रता मंढोत्रा को सचिव, अनु कंवर को सह सचिव, लोकेंद्रा बंटा को कोषाध्यक्ष और उर्मिल गुप्ता को स्टोर इंचार्ज की जिम्मेदारी दी है। कार्यकारी सदस्यों के रूप में लता थापा, रेणु शर्मा, ममता और सरिता ठाकुर को शामिल किया गया है। नवनियुक्त सचिव नम्रता मंढ़ौत्रा ने बताया कि उत्तर भारत में यह पहली ऐसी मंदिर कार्यकारिणी है, जिसमें सभी पदों की जिम्मेदारी महिलाओं को सौंपी गई है। उन्होंने इसे महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक उल्लेखनीय पहल बताया। वर्ष 1995 में केवल कृष्ण वर्मा ने मंदिर के सचिव का दायित्व संभाला। इनके कार्यकाल में मंदिर में दो और सुंदर हाल का निर्माण किया गया।वर्ष 2022 में राजेश सूद ने सचिव और निखिल लूंबा ने कोषाध्यक्ष का दायित्व संभाला। मंदिर के इतिहास में वर्ष 2026 भी महत्वपूर्ण पड़ाव बनकर सामने आया, जब पहली बार पूरी महिला कार्यकारिणी का चयन किया गया। इससे पहले महिलाएं मुख्य रूप से भजन-कीर्तन और सेवा कार्यों तक ही सीमित रहती थीं।
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74 साल पहले हुई थी मंदिर की शुरुआत

बालूगंज स्थित गोपाल मंदिर की कहानी करीब 74 वर्षों की आस्था, सेवा और सामूहिक प्रयास की कहानी है। करीब 75 से 80 वर्ष पहले बालूगंज की महिलाएं डॉक्टर खड़क सिंह के घर साप्ताहिक भजन-कीर्तन किया करती थीं। वर्ष 1952 में मंदिर के लिए भूमि उपलब्ध होने के बाद यहां टीन का शेड बनाकर पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन शुरू किए गए। वर्ष 1953 में श्री विशंभर दास के संरक्षण में मंदिर की पहली कार्यकारिणी का गठन हुआ। इसमें डॉक्टर खड़क सिंह को अध्यक्ष और चटर्जी को सचिव बनाया गया। इसके बाद पुरुषों के नेतृत्व में समय-समय पर कई कार्यकारिणियां गठित होती रहीं। मंदिर में आने वाले दान और अन्य आय से धीरे-धीरे इसका विस्तार होता गया। सबसे पहले मंदिर के गर्भगृह और मुख्य हाल का निर्माण किया गया। इसके बाद रसोईघर और तीन अन्य हाल बनाए गए।
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