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Parkinson's Disease: दिमाग को प्रभावित करने वाले पार्किंसंस रोग का इलाज हो सकेगा, आईआईटी मंडी ने खोजा प्रोटीन

Thu, 29 Feb 2024 06:43 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी Published by: Krishan Singh Updated Thu, 29 Feb 2024 06:43 PM IST
सार

आईआईटी मंडी के शोधार्थियों ने अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर एक ऐसे प्रोटीन का पता लगाया है जोकि रोग को फैलाने में जिम्मेदार है। 

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Parkinson's disease affecting the brain can be treated, IIT Mandi discovered protein
आईआईटी मंडी। - फोटो : संवाद

विस्तार

मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को प्रभावित करके दिमाग के कार्यों को अव्यवस्थित करने वाले रोग पार्किंसंस का इलाज संभव हो सकेगा। आईआईटी मंडी के शोधार्थियों ने अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर एक ऐसे प्रोटीन का पता लगाया है जोकि रोग को फैलाने में जिम्मेदार है। पार्किंसंस में देखा जाने वाला प्रोटीन, अल्फा-सिन्यूक्लिन, का फॉस्फोराइलेशन न केवल पार्किंसंस रोग में, बल्कि सामान्य मस्तिष्क क्रिया को भी प्रभावित कर सकता है।

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पूरे विश्व में पार्किंसंस रोग तेजी से बढ़ रहा है और विशेषज्ञों का यह अनुमान है कि अगले दो से तीन दशकों में भारत में इसके मामलों में 200-300 प्रतिशत तक की भारी वृद्धि हो सकती है। दुनियाभर के शोधकर्ता इस बीमारी की जटिलताओं को सुलझाने में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। वह इसके कारणों और विकास से लेकर इसके पैटर्न और परिणामों को समझने का प्रयास कर रहे हैं। पार्किंसंस रोग से जुड़े एक खास प्रोटीन की प्रकृति को समझने के लिए कई तकनीकों का इस्तेमाल किया है। यह प्रोटीन, जिसे अल्फा-सिन्यूक्लिन कहा जाता है। यह मनुष्य दिमाग में भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
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पार्किंसंस रोग और इससे जुड़ी बीमारियों से ग्रस्त लोगों में यह प्रोटीन अत्यधिक फॉस्फोराइलेटेड होता है, यानि इस प्रोटीन के एक विशेष अमीनो एसिड (सेरीन-129) से जुड़े फॉस्फेट समूहों की संख्या बहुत अधिक होती है। मस्तिष्क में मौजूद प्रोटीनों पर फॉस्फोराइलेशन को आप आणविक स्तर पर एक मास्टर स्विच की तरह समझ सकते हैं।

इसमें बहुत छोटा फॉस्फेट समूह प्रोटीन से जुड़ जाता है। यह क्रिया एक स्विच को दबाने के समान है, जो उस प्रोटीन को सक्रिय या निष्क्रिय कर देता है। इससे प्रोटीन के दूसरे प्रोटीनों से जुड़ने का तरीका प्रभावित होता है और यही जुड़ाव पार्किंसंस रोग को बढ़ा सकता है। अब पार्किंसंस रोग के बढ़ने को नियंत्रित किया जा सकेगा।

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आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ मैकेनिकल एंड मटीरियल्स इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफेसर डॉ. दुबे धीरज प्रकाश चंद ने बताया कि यह महत्वपूर्ण अध्ययन पार्किंसंस से जुड़े एक प्रोटीन परिवर्तन को समझने का नया तरीका देता है। यह दिखाता है कि ए-सिन्यूक्लिन प्रोटीन पर एक निश्चित स्थान पर होने वाला फॉस्फोराइलेशन नामक परिवर्तन सिर्फ बीमारी का सूचक ही नहीं है, बल्कि सामान्य मस्तिष्क कार्य के लिए भी यह महत्वपूर्ण है। इस अध्ययन से पता चलता है कि इस प्रक्रिया को रोकने से मस्तिष्क क्रिया को नुकसान पहुंच सकता है। वहीं, इससे पार्किंसंस के इलाज के बारे में सोचने के नए तरीके सामने आ सकते हैं।

चूहों पर किया गया प्रयोग
वैज्ञानिकों की एक टीम ने चूहों पर इस प्रक्रिया का अध्ययन करके यह समझने की कोशिश की है कि यह खास प्रोटीन कैसे काम करता है और उस पर होने वाले बदलाव (फॉस्फोराइलेशन) का क्या असर होता है। उन्होंने पाया कि अगर इस प्रोटीन के बदलाव को रोका जाए तो दिमाग के सामान्य काम पर बुरा असर पड़ता है। इसका मतलब है कि यह बदलाव दिमाग के लिए जरूरी है और इसे पूरी तरह से रोकना सही नहीं होगा। वैज्ञानिक अब यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि इस बदलाव को कैसे नियंत्रित किया जा सके, ताकि पार्किंसंस रोग का इलाज किया जा सके और दिमाग को स्वस्थ रखा जा सके।

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