बच्चों की इस बीमारी के इलाज के लिए अब नहीं जाना पड़ेगा चंडीगढ़
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नवजात बच्चों में सुनने की क्षमता का पता लगाने के लिए सभी जिला अस्पतालों में उत्सर्जन परीक्षण (ओटअकौस्तिक) मशीन स्थापित की गई है। इसके जरिये नवजात बच्चों में सुनने की क्षमता का पता लगाया जाएगा। अगर मशीन ने ओके किया तो क्षमता सही है, अगर रेफर किया तो नवजात को इलाज के लिए शिमला या चंडीगढ़ ले जाना होगा।
इससे पहले नवजात बच्चों के सुनने की क्षमता का पता लगाने के लिए इन्हें शिमला या चंडीगढ़ ले जाना पड़ता था। अब सभी जिला अस्पतालों में ये मशीनें स्थापित की जाएंगी। शिशु रोग विशेषज्ञों की मानें तो सबसे ज्यादा बहरेपन का खतरा उन नवजात बच्चों को होता है, जो समय से पहले पैदा हो गए हों या मां के पेट में घुट गए हों, जिन्हें जन्म से ही ऑक्सीजन लगी हो या फिर किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त हों।
सभी जिला अस्पतालों में ओटअकौस्तिक मशीनें
ऐसे में जब कोई महिला ऐसे बच्चे को जन्म देती थी तो यह पता लगाना मुश्किल होता था कि उसके सुनने की क्षमता कितनी है। जब वह बड़ा होता था तो पता चलता था कि उसकी सुनने की क्षमता कम है। अब स्वास्थ्य विभाग ने सभी जिला अस्पतालों को ओटअकौस्तिक मशीनें उपलब्ध करवा दी हैं।
इस मशीन को बच्चों को लगाकर देखा जाएगा कि उसकी सुनने की क्षमता सही है या नहीं, जैसे ही मशीन को लगाया जाएगा तो मशीन बच्चे के स्वस्थ होने पर पास लिखकर देगी। अगर कोई कमी पाई गई तो रेफर लिखकर सचेत करेगी।
उधर, शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सतीश शर्मा का कहना है कि बिलासपुर सहित अन्य जिलों के मुख्य अस्पतालों को मशीन दी गई है। इससे पहले शिमला या चंडीगढ़ ही नवजात बच्चों के बहरेपन का पता लग पाता था।