यहां बिना बैंड बाजा दुल्हन जाती है दूल्हे से ब्याह रचाने
हिमाचल में ब्याह-शादियों में भले ही एक दिन में लाखों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं, लेकिन शिमला जिले के ठियोग, कोटखाई, चौपाल और ऊपरी क्षेत्रों में आज भी परैणा विवाह का चलन है जिसमें लड़की के घरवालों का एक भी पैसा खर्च नहीं होता। इस प्रथा में दूल्हा नहीं बल्कि दुल्हन सजधज कर अपने होने वाले ससुराल में ब्याह रचाने पहुंचती है। यहां तक कि दूल्हे के परिजन ही उसे गाड़ी में लेने आते हैं।
दूल्हे के घर पर मंडप सजता है और वहीं सात फेरे होते हैं। दूल्हे के सिर पर न सेहरा होता है और न ही कोई बैंड बाजा। शादी बिलकुल सादे तरीके से होती है। लड़की के मां-बाप न तो अपनी बेटी की शादी में शामिल होते हैं और न ही कन्यादान करते हैं। शादी समारोह में धाम भी दूल्हा ही देता है। इसके बाद दुल्हन का गृह प्रवेश हो जाता है।
...और यहां दुल्हन के परिवार को दिया जाता है दहेज
तड़क-भड़क के दौर में दुल्हन के परिवार को दहेज, धाम और अन्य खर्चों से बचाने के लिए सदियों से चल आ रही परंपरा आज भी कायम है। कई पढे़-लिखे लोग भी परैणा विवाह को ज्यादा तवज्जो देने लगे हैं। शिमला जिले में ऐसी हजारों शादियां हो चुकी हैं।
दुल्हन के माता-पिता अपनी बेटी के शादी समारोह में शरीक ही नहीं होते। वे अगले दिन अपने घर से आटा और सब्जियां-दालें और चावल लेकर बेटी के ससुराल जाते हैं। उनके यहां मां अपने हाथ से खाना बनाती है। बेटी और दामाद को परोसती हैं।
हिमाचल के हर क्षेत्र में अपनी-अपनी संस्कृति है। शिमला जिले की ठियोग तहसील और इसके आसपास कई क्षेत्रों में अभी भी परैणा विवाह प्रथा है। सदियों से यह प्रथा चली आ रही है। लोग आज भी परैणा विवाह में विश्वास रखते हैं। दुल्हन पक्ष का इसमें कोई पैसा खर्च नहीं होता। -मोहन झारटा, हिमाचल विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र के प्रोफेसर