हिमाचल: अब स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी जानेंगे स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन राम सिंह का इतिहास
प्रदेश सरकार ने उच्च शिक्षा विभाग और भाषा, संस्कृति विभाग को आईएनए के बैंडमास्टर और स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन राम सिंह ठाकुर की स्मृति पर लिखित पुस्तक की खरीद करने के निर्देश दिए हैं। भाषा विभाग के निदेशक ने प्रदेश के सभी 12 जिलों के जिला भाषा अधिकारियों को अपने कार्यालय के लिए इस पुस्तक का क्रय करने के निर्देश दिए हैं।
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हिमाचल के स्कूलों और कॉलेजों के विद्यार्थी अब स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन राम सिंह ठाकुर के बारे में जान सकेंगे। प्रदेश सरकार ने उच्च शिक्षा विभाग और भाषा, संस्कृति विभाग को आईएनए के बैंडमास्टर और स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन राम सिंह ठाकुर की स्मृति पर लिखित पुस्तक की खरीद करने के निर्देश दिए हैं। भाषा विभाग के निदेशक ने प्रदेश के सभी 12 जिलों के जिला भाषा अधिकारियों को अपने कार्यालय के लिए इस पुस्तक का क्रय करने के निर्देश दिए हैं। शिक्षा विभाग ने भी पुस्तक खरीद से पूर्व की औपचारिकताएं शुरू कर दी हैं। हमीरपुर के गांव बल्ह निवासी लेखक एवं साहित्यकार राजेंद्र राजन ने अनसंग कंपोजर ऑफ आईएनए कैप्टन राम सिंह ठाकुर के जीवन, राष्ट्रगान की धुन की रचना और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान पर आधारित एक पुस्तक लिखी है। जिसका इसी साल भारतीय ज्ञानपीठ ट्रस्ट दिल्ली ने प्रकाशन किया है।
आजाद हिंद फौज के सिपाहियों के लिए बनाई थी गाने की विशेष धुन
स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान के साथ-साथ कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने कई ऐसे गाने लिखे और कई गानों का संगीत दिया, जो आज भी स्वतंत्रता संग्राम की यादों को जीवंत बनाते हैं। आजाद हिंद फौज का गठन कर नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजाया था। तब आजाद हिंद फौज के कैप्टन राम सिंह ठाकुर को ऐसा जोशीला संगीत बनाने के लिए कहा गया कि फौज का जोश ठंडा न पड़े। कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने कदम कदम बढ़ाए जा...’ जैसे देशभक्ति से गीत की धुन बनाई। उन्होंने भारत के राष्ट्रीय गान जन-गण-मन’ की धुन बनाकर देशभर में विशेष पहचान पाई थी।
15 अगस्त, 1947 को कैप्टन राम सिंह के नेतृत्व में आईएनए (इंडियन नेशनल आर्मी) के आर्केस्ट्रा ने लाल किले पर शुभ सुख चैन की बरखा बरसे...गीत की धुन बजाई। 15 अगस्त 1914 को धर्मशाला के चीलगाड़ी में जन्मे राम सिंह का बाल्यकाल धौलाधार की गोद में बसे खनियारा गांव में गुजरा। बचपन में जानवर के सींग से वाद्य यंत्र बनाकर धुन निकालने वाले राम सिंह 1922 में 14 साल की उम्र में गोरखा ब्वॉय कंपनी में भर्ती हुए। ब्रिटिश सेना में सेवाएं देने के बाद वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में आ गए। द्वितीय विश्वयुद्ध में अपनी वीरता का प्रदर्शन कर कई मेडल उन्होंने जीते। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के अनुरोध पर राम सिंह उत्तर प्रदेश में सब इंस्पेक्टर के रूप में लखनऊ आए और पीएसी के बैंड मास्टर बने। 15 अप्रैल 2002 को उनका निधन हो गया।