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यहां तैयार हो सकेगा अब उम्दा क्वालिटी का कत्था, उत्पादन की आधुनिक तकनीक विकसित

Tue, 16 Jan 2018 12:29 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, सोलन
अमर उजाला ब्यूरो, सोलन Updated Tue, 16 Jan 2018 12:29 PM IST
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now high quality kattha will be produced in himachal

नौणी यूनिवर्सिटी के फॉरेस्ट प्रोडक्ट विभाग ने कत्था उत्पादन की नई तकनीक विकसित की है। इसे जल्द कत्था उत्पादन करने वाले उद्योगों को हस्तांतरित किया जाएगा। हिमाचल को कत्था उत्पादन के लिए जाना जाता है। 

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सूबे में तैयार होने वाले कत्थे की देश भर में मांग है। देश के कुल कत्था उत्पादन का 70 फीसदी उत्पादन हिमाचल में होता है। यहां तैयार होने वाला कत्था अब पहले से साफ और हाई क्वालिटी का होगा। इसका प्रयोग पान मसाला, मुंह और पेट के रोगों के इलाज आदि के लिए किया जाता है। 
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कत्था उत्पादन की नई तकनीक में खैर की लकड़ी के टुकड़े (चिप्स) को ब्वॉयलर में डाला जाता है। इसे तब तक बनाया जाता है, जब तक उसमें थिकनेस न आए। थिकनेस आनी शुरू होती है तो फ्रीजिंग कंडीशन में रखा जाता है। 
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इस दौरान तैयार माल को 4 से 7 डिग्री तापमान में रखना पड़ता है। इसके बाद कत्थे से कच (डाई) को अलग किया जाता है। इसके लिए ठंडे पानी से हल्के से कत्थे को साफ करना होता है। 

पहले की विधि से 7 से 10 फीसदी कत्था मिलता था। वहीं, नई तकनीक से 8 से 12 फीसदी कत्था मिलेगा। इसी प्रकार नई विधि से 6 से 15 फीसदी कच मिलेगी।

यह है कत्था निकालने की पारंपरिक विधि

now high quality kattha will be produced in himachal

पहले देसी तकनीक से कत्था निकाला जाता था। लाल हार्ड वुड (नील) को ठंडे पानी में डाला जाता था। इससे डाई निकलती है। फिर कथई रंग निकलता है। इसके बाद खैर के टुकड़े (चिप्स) को 6 बार बॉलिंग दी जाती थी। हांडियों में या बॉयलर में पकाते-पकाते थिकनेस आती तो गड्ढा बनाया जाता था।

इसे रेत से भरा जाता था और जूट के बैग बिछाए जाते थे। डाई का पार्ट रेत में डाला जाता था। कई बार फंगस लग जाती थी और कत्थे का रंग काला होता था। कत्थे से फंगस दूर करने को सोडियम बेंजोएट डाली जाती है।

नालागढ़, नूरपुर और ऊना कत्था बेस्ट
कत्था खैर के पौधों से तैयार होता है। सोलन के नालागढ़, कांगड़ा के नूरपुर और ऊना जिले को अच्छी क्वालिटी के कत्था उत्पादन के लिए जाना जाता है। सूबे का कत्था 500 रुपये प्रतिकिलो बिकता है। खैर के पौधे की आयु 30 वर्ष होती है। इसमें 10 साल से 30 साल के बीच के पौधे का कत्था बनाने को कटान किया जाता है। 30 साल बाद अकसर खैर का पेड़ खोखला हो जाता है।

उच्च गुणवत्ता का कत्था तैयार करने में सफलता
डॉ. यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी नौणी के फॉरेस्ट प्रोडक्ट विभाग के एचओडी डॉ. कुलवंत राय ने बताया कि यूनिवर्सिटी ने हाई क्वालिटी कत्था उत्पादन की तकनीक विकसित की है। इससे साफ रंग और उच्च गुणवत्ता का कत्था उत्पादन करने में सफलता मिली है। इससे प्रदेश में कत्था उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। यह तकनीक शीघ्र हस्तांतरित की जाएगी। 

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