चौदह साल में 2315 लोगों को जख्मी कर चुके हैं बंदर
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हिमाचल में गांवों से लेकर शहरों तक बंदरों का आतंक जारी है। राज्य वन विभाग के आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। विभाग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार राज्य में बीते 14 सालों में बंदरों ने 2315 लोगों को जख्मी किया। इनमें 30 लोग गंभीर घायल हुए, जबकि 2285 को मामूली चोटें आईं। वन विभाग मुआवजे के तौर पर पीड़ितों को अब तक 1 करोड़ से अधिक जारी कर चुका है।
राज्य में 83 रेंज की 348 बीटों में बंदरों की अधिक संख्या अधिक है। यह आंकड़े 2004-05 से लेकर 2017-18 की रिपोर्ट के हैं। सरकार ने सबसे पहले साल 2016 में एमसी शिमला में बंदरों को 6 माह के लिए वर्मिन घोषित किया। छह माह बाद 20 दिसंबर, 2017 को हिमाचल के 10 जिलों की 38 तहसीलों सहित एमसी शिमला में बंदरों को एक साल के लिए वर्मिन घोषित गया।
इसके लिए इतनी शर्तें और औपचारिकताएं थोप दीं कि लोग इसमें उलझकर रह गए। हालांकि, बंदरों को मारने से समस्या का हल नहीं हो सकता और इससे लोगों की धार्मिक भावनाएं भी जुड़ी हुई हैं। लोग भी मांग करते रहे कि बंदरों की समस्या के समाधान को अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए।
सिर्फ पांच बंदरों को मारा
एमसी शिमला सहित राज्य की 38 तहसीलों में 20 दिसंबर 2018 तक बंदरों को मारने के लिए दी गई छूट खत्म हो जाएगी, लेकिन साल 2016 से अब तक सिर्फ 5 बंदरों को मारने की रिपोर्ट ही वन विभाग के पास पहुंची है। इसमें किलिंग का एक मामला सोलन के कुनिहार तहसील का है। चार मामले जिला सिरमौर के रेणुका से आए हैं।
शहरों में बंदरों की समस्या के लिए कूड़ा भी जिम्मेदार- वन विभाग की मानें तो शहरों में खुले में पड़ा कूड़ा बंदरों की समस्या के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। शिमला शहर में कई इलाकों में कूड़ा खुले में पड़ा रहता था। इसके चलते बंदर खाने की तलाश में यहां पहुंचते हैं। इससे उनके व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है।
हिमाचल में बंदरों की नसबंदी साल 2006-07 से शुरू हुई। अब तक करीब 1 लाख 44 हजार 520 बंदरों की नसबंदी हुई है। विभाग के सर्वे के मुताबिक राज्य में बंदरों की संख्या 207614 है। बंदरों की नसबंदी पर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं। यदि मादा बंदर गर्भवती हैं तो उसकी नसबंदी नहीं की जाती। इसे छोड़ना पड़ता है। बाद में इसकी नसबंदी हुई या नहीं, इसका पता लगाना मुश्किल रहता है।
इसके अलावा कई बार ग्रुप में भी कुछ बंदर बिना नसबंदी के ही रह जाते हैं। वन विभाग के सीसीएफ वन्यप्राणी दक्षिण सुशील कप्टा ने कहा कि बंदरों की समस्या को लेकर विभाग पंचायतों में कैंप लगाकर लोगों को जागरूक कर रहा है। प्रति बंदर मारने पर लोगों को 500 रुपये दिए जा रहे हैं। लोगों को चाहिए कि बंदरों की समस्या के समाधान के लिए अन्य विकल्पों पर भी विचार करें।