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Shimla News: सांस की बीमारी में कुपोषण बड़ा खतरा, पोषण युक्त आहार जरूरी
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इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज में क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज के मरीजों पर छह महीने तक किए अध्ययन में खुलासा
66 फीसदी मरीजों में पाई गई पोषण की भारी कमी
एक्सक्लूससिव
हर्षित शर्मा
शिमला। इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) में सांस की गंभीर बीमारियों क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज ( सीओपीडी) पर किए विस्तृत अध्ययन ने उपचार व्यवस्था और मरीजों की वास्तविक स्थिति के बीच एक बड़ा अंतर उजागर किया है।
अध्ययन में पाया गया कि बीमारी से जूझ रहे मरीजों में कुपोषण एक समानांतर और गंभीर समस्या के रूप में मौजूद है जो न केवल बीमारी को जटिल बनाता है बल्कि उपचार की प्रभावशीलता को भी सीमित करता है। डॉ. हर्ष ठाकुर और डॉ. राहुल राव के इस शोध में 110 मरीजों को शामिल किया जिनकी उम्र 20 से 90 वर्ष के बीच थी। इनमें 60 महिलाएं और 50 पुरुष शामिल थे। यह अध्ययन आईजीएमसी के पल्मोनरी वार्ड में किया गया जहां मरीजों से आमने-सामने बातचीत की गई। मेडिकल जांच और तीन दिन के डाइट के आधार पर विस्तृत जानकारी जुटाई गई। अध्ययन के निष्कर्षों में सामने आया कि करीब 66 प्रतिशत मरीज कुपोषित श्रेणी में आते हैं। बड़ी संख्या में मरीजों का बॉडी मास इंडेक्स सामान्य से कम पाया गया जो उनकी कमजोर पोषण स्थिति को दर्शाता है। कई मरीजों में वजन घटने, लगातार कमजोरी, सांस लेने में दिक्कत और दैनिक गतिविधियों में कमी जैसे लक्षण स्पष्ट रूप से दर्ज किए गए। खानपान के विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि मरीजों के दैनिक आहार में संतुलन की कमी है। हरी सब्जियां, दूध, प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (आवश्यक पोषक तत्व) का सेवन अनुशंसित स्तर से कम पाया गया। इसके साथ ही औसत कैलोरी सेवन भी तय मानकों से नीचे रहा जिससे शरीर की ऊर्जा आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पा रही हैं। अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया कि सीओपीडी के उपचार में केवल दवाइयों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। यदि पोषण की कमी को साथ दूर नहीं किया गया तो मरीजों की स्थिति में अपेक्षित सुधार संभव नहीं होगा। इसलिए संतुलित आहार, पोषण सपोर्ट और नियमित मॉनिटरिंग को इलाज का अनिवार्य हिस्सा बनाने की जरूरत बताई गई है।
धूम्रपान, प्रदूषण और धुएं से बढ़ रहे सांस के मरीज
अध्ययन में सांस के रोगियों के बढ़ते मामलों के पीछे जिम्मेदार कारकों का भी विस्तार से विश्लेषण किया गया है। धूम्रपान को सबसे बड़ा जोखिम कारक पाया गया। विशेषकर पुरुष मरीजों में इसकी दर अधिक रही। इसके अलावा घरेलू स्तर पर लकड़ी और कोयले के चूल्हों से निकलने वाला धुआं भी एक अहम कारण के रूप में सामने आया जो लंबे समय तक संपर्क में रहने वालों के फेफड़ों को प्रभावित करता है। महिलाओं में धूम्रपान की दर अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद, घरेलू धुएं के लगातार संपर्क के कारण उनमें भी बीमारी के मामले सामने आए। अध्ययन में यह भी पाया गया कि भीड़भाड़ वाले घरों में रहने, सीमित वेंटिलेशन और साफ ईंधन की कमी जैसी परिस्थितियां जोखिम को बढ़ाती हैं। इसके साथ ही सामाजिक और आर्थिक कारक भी रोगों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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यह सीओपीडी
क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज फेफड़ों से जुड़ी एक गंभीर और लंबे समय तक रहने वाली बीमारी है जिसमें सांस लेना धीरे-धीरे मुश्किल होता जाता है। यह कोई एक बीमारी नहीं बल्कि बीमारियों का समूह है जिसमें मुख्य रूप से क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस और एम्फायसेमा शामिल है। इस स्थिति में फेफड़ों की वायु नलिकाएं संकरी हो जाती हैं या उनमें सूजन आ जाती है, जिससे हवा का आना-जाना बाधित होता है। सीओपीडी के मरीजों को अक्सर लगातार खांसी, बलगम, सांस फूलना, सीने में जकड़न और थकान जैसी समस्याएं होती हैं। धूम्रपान, वायु प्रदूषण और धुएं के संपर्क को इसका प्रमुख कारण माना जाता है। सही समय पर पहचान, उपचार और जीवनशैली में बदलाव से इस बीमारी को काफी नियंत्रित किया जा सकता है।
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66 फीसदी मरीजों में पाई गई पोषण की भारी कमी
एक्सक्लूससिव
हर्षित शर्मा
शिमला। इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) में सांस की गंभीर बीमारियों क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज ( सीओपीडी) पर किए विस्तृत अध्ययन ने उपचार व्यवस्था और मरीजों की वास्तविक स्थिति के बीच एक बड़ा अंतर उजागर किया है।
अध्ययन में पाया गया कि बीमारी से जूझ रहे मरीजों में कुपोषण एक समानांतर और गंभीर समस्या के रूप में मौजूद है जो न केवल बीमारी को जटिल बनाता है बल्कि उपचार की प्रभावशीलता को भी सीमित करता है। डॉ. हर्ष ठाकुर और डॉ. राहुल राव के इस शोध में 110 मरीजों को शामिल किया जिनकी उम्र 20 से 90 वर्ष के बीच थी। इनमें 60 महिलाएं और 50 पुरुष शामिल थे। यह अध्ययन आईजीएमसी के पल्मोनरी वार्ड में किया गया जहां मरीजों से आमने-सामने बातचीत की गई। मेडिकल जांच और तीन दिन के डाइट के आधार पर विस्तृत जानकारी जुटाई गई। अध्ययन के निष्कर्षों में सामने आया कि करीब 66 प्रतिशत मरीज कुपोषित श्रेणी में आते हैं। बड़ी संख्या में मरीजों का बॉडी मास इंडेक्स सामान्य से कम पाया गया जो उनकी कमजोर पोषण स्थिति को दर्शाता है। कई मरीजों में वजन घटने, लगातार कमजोरी, सांस लेने में दिक्कत और दैनिक गतिविधियों में कमी जैसे लक्षण स्पष्ट रूप से दर्ज किए गए। खानपान के विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि मरीजों के दैनिक आहार में संतुलन की कमी है। हरी सब्जियां, दूध, प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (आवश्यक पोषक तत्व) का सेवन अनुशंसित स्तर से कम पाया गया। इसके साथ ही औसत कैलोरी सेवन भी तय मानकों से नीचे रहा जिससे शरीर की ऊर्जा आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पा रही हैं। अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया कि सीओपीडी के उपचार में केवल दवाइयों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। यदि पोषण की कमी को साथ दूर नहीं किया गया तो मरीजों की स्थिति में अपेक्षित सुधार संभव नहीं होगा। इसलिए संतुलित आहार, पोषण सपोर्ट और नियमित मॉनिटरिंग को इलाज का अनिवार्य हिस्सा बनाने की जरूरत बताई गई है।
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धूम्रपान, प्रदूषण और धुएं से बढ़ रहे सांस के मरीज
अध्ययन में सांस के रोगियों के बढ़ते मामलों के पीछे जिम्मेदार कारकों का भी विस्तार से विश्लेषण किया गया है। धूम्रपान को सबसे बड़ा जोखिम कारक पाया गया। विशेषकर पुरुष मरीजों में इसकी दर अधिक रही। इसके अलावा घरेलू स्तर पर लकड़ी और कोयले के चूल्हों से निकलने वाला धुआं भी एक अहम कारण के रूप में सामने आया जो लंबे समय तक संपर्क में रहने वालों के फेफड़ों को प्रभावित करता है। महिलाओं में धूम्रपान की दर अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद, घरेलू धुएं के लगातार संपर्क के कारण उनमें भी बीमारी के मामले सामने आए। अध्ययन में यह भी पाया गया कि भीड़भाड़ वाले घरों में रहने, सीमित वेंटिलेशन और साफ ईंधन की कमी जैसी परिस्थितियां जोखिम को बढ़ाती हैं। इसके साथ ही सामाजिक और आर्थिक कारक भी रोगों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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यह सीओपीडी
क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज फेफड़ों से जुड़ी एक गंभीर और लंबे समय तक रहने वाली बीमारी है जिसमें सांस लेना धीरे-धीरे मुश्किल होता जाता है। यह कोई एक बीमारी नहीं बल्कि बीमारियों का समूह है जिसमें मुख्य रूप से क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस और एम्फायसेमा शामिल है। इस स्थिति में फेफड़ों की वायु नलिकाएं संकरी हो जाती हैं या उनमें सूजन आ जाती है, जिससे हवा का आना-जाना बाधित होता है। सीओपीडी के मरीजों को अक्सर लगातार खांसी, बलगम, सांस फूलना, सीने में जकड़न और थकान जैसी समस्याएं होती हैं। धूम्रपान, वायु प्रदूषण और धुएं के संपर्क को इसका प्रमुख कारण माना जाता है। सही समय पर पहचान, उपचार और जीवनशैली में बदलाव से इस बीमारी को काफी नियंत्रित किया जा सकता है।