हिमाचल में बंदरों का आतंक: संख्या आधी से भी कम हुई, फिर भी इंसानों पर हमले; समझिए पूरी समस्या आखिर है क्या?
हिमाचल प्रदेश में बंदरों की संख्या पिछले दो दशकों में काफी कम हुई है, लेकिन मानव-बंदर संघर्ष अभी भी गंभीर समस्या बना हुआ है। वन विभाग के अनुसार 2004 में करीब 3.17 लाख बंदरों से घटकर आबादी 2019/20 के आकलन में 1.36 लाख रह गई। इसके बावजूद शहरों में खुले भोजन, कचरे और लोगों के संपर्क के कारण बंदरों के हमले जारी हैं। समस्या का समाधान सिर्फ नसबंदी नहीं, बल्कि कचरा प्रबंधन और व्यवहार में बदलाव से भी जुड़ा है।
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हिमाचल प्रदेश में बंदरों का आतंक कोई नई समस्या नहीं है। खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने से लेकर शहरों में घरों की छतों पर पहुंचने और लोगों पर हमला करने तक, बंदर लंबे समय से मानव-बंदर संघर्ष की बड़ी वजह बने हुए हैं।
हाल ही में शिमला के समिट्री क्षेत्र में 63 वर्षीय सत्या देवी पर बंदरों के झुंड ने हमला कर दिया। बचने के दौरान वह मकान की छत से नीचे आंगन में गिर गईं और गंभीर रूप से घायल हो गईं। उन्हें आईजीएमसी के आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। यह घटना एक बार फिर उस समस्या को सामने लाती है, जिसका सामना हिमाचल के कई शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में लोग कर रहे हैं। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है कि अगर बंदरों की संख्या लगातार कम हुई है तो उनका आतंक कम क्यों नहीं हुआ? इसका जवाब सिर्फ बंदरों की संख्या में नहीं, बल्कि इंसानों और बंदरों के बदलते संबंध में छिपा है।
हिमाचल प्रदेश में बंदरों की संख्या पिछले दो दशकों में लगातार घटने का दावा सरकारी आंकड़ों में सामने आता है। वन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2004 में प्रदेश में करीब 3 लाख 17 हजार 512 बंदर थे। वर्ष 2013 में यह संख्या घटकर 2 लाख 26 हजार 86, जबकि 2015 में 2 लाख 7 हजार 614 रह गई। इसके बाद 2019/20 के आकलन में प्रदेश में बंदरों की संख्या 1 लाख 36 हजार 443 दर्ज की गई। यानी 2004 के मुकाबले 2019/20 तक बंदरों की अनुमानित संख्या में करीब 1.81 लाख की कमी आई। प्रतिशत के लिहाज से यह गिरावट लगभग 57 फीसदी बैठती है।
- 2004: 3,17,512
- 2013: 2,26,086
- 2015: 2,07,614
- 2019/20: 1,36,443
हिमाचल प्रदेश देश में बंदरों की नसबंदी का संगठित कार्यक्रम शुरू करने वाले अग्रणी राज्यों में रहा है। वन विभाग के अनुसार प्रदेश में यह कार्यक्रम 2006 में शुरू किया गया था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2024 तक कुल 1,86,448 बंदरों की नसबंदी की जा चुकी थी। प्रदेश में बंदरों की नसबंदी के लिए कई केंद्र भी संचालित किए गए हैं। इनमें शिमला का टूटू-केंद्र सहित हमीरपुर, कांगड़ा, ऊना, सिरमौर, चंबा और मंडी क्षेत्र के केंद्र शामिल हैं। इस अभियान का उद्देश्य सिर्फ बंदरों की संख्या कम करना नहीं था, बल्कि भविष्य में उनकी आबादी की तेज वृद्धि को नियंत्रित करना भी था। वन विभाग के अनुसार नसबंदी के बाद बंदरों की आबादी में गिरावट भी दर्ज की गई है।
यहीं से समस्या का दूसरा पक्ष सामने आता है। बंदरों के लिए शहरों और रिहायशी इलाकों में भोजन आसानी से उपलब्ध हो जाता है। घरों की छतों पर रखा खाना, खुले कूड़ेदान, फल-सब्जियों का कचरा और लोगों की ओर से बंदरों को खाना खिलाना उन्हें इंसानी बस्तियों की ओर खींचता है। हिमाचल वन विभाग खुद मानता है कि शहरी इलाकों में मानव भोजन के बचे हुए हिस्से की आसानी से उपलब्धता बंदरों और इंसानों के बीच संपर्क बढ़ाने वाली प्रमुख वजहों में है। इससे हमले, फसलों को नुकसान और अन्य तरह के संघर्ष की स्थिति बनती है। यानी बंदरों की संख्या कम होना और बंदरों का शहरों से दूर होना—दो अलग-अलग बातें हैं।
शिमला जैसे शहर में पहाड़ी ढलानों, घनी आबादी और घरों की बनावट के कारण बंदरों को एक जगह से दूसरी जगह जाने में आसानी होती है। कई इलाकों में घरों की छतें पेड़ों और दूसरी इमारतों से जुड़ी रहती हैं। ऐसे में बंदरों के लिए छतों तक पहुंचना आसान होता है। शिमला के जाखू, संजौली, लक्कड़ बाजार, छोटा शिमला, समरहिल, चौड़ा मैदान समेत कई इलाकों में बंदरों की समस्या लंबे समय से बताई जाती रही है। शहर में बंदरों के काटने के मामले भी सामने आते रहते हैं। 2025 में एक रिपोर्ट में शिमला में औसतन 50-55 बंदर काटने के मामलों की बात सामने आई थी। हाल के वर्षों में बंदर हमले के बाद गंभीर रूप से घायल होने और मौत की घटनाओं ने भी चिंता बढ़ाई है। सितंबर 2025 में शिमला के लोअर बाजार की 71 वर्षीय महिला की बंदर हमले में घायल होने के बाद स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं के चलते मौत हो गई थी।
हिमाचल में बंदरों का संघर्ष सिर्फ शहरी समस्या नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में बंदर किसानों की फसलों और बागवानी को नुकसान पहुंचाते हैं। मक्की, फल और दूसरी फसलों को नुकसान के कारण कई किसान बंदरों से परेशान रहे हैं। वन विभाग ने भी माना है कि बंदरों के कारण कृषि क्षेत्र में काफी नुकसान होता है और कई स्थानों पर यह किसानों की आजीविका के लिए समस्या बनता है। वहीं शहरों में समस्या का स्वरूप बदल जाता है। यहां बंदर खेतों की बजाय घरों, दुकानों, छतों और कूड़ेदानों तक पहुंचते हैं। लोगों से सीधे संपर्क बढ़ने के कारण हमले और काटने की घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि नसबंदी आबादी नियंत्रण का उपाय है, मानव-बंदर संघर्ष का अकेला समाधान नहीं। अगर किसी इलाके में बंदरों को आसानी से खाना मिलता रहेगा तो नसबंदी के बावजूद वहां मौजूद बंदरों का झुंड इंसानी बस्तियों में आता रहेगा। वन विभाग की अपनी रिपोर्ट में भी कहा गया है कि आबादी घटने के बावजूद मानव-बंदर संघर्ष गंभीर चिंता बना हुआ है। रिपोर्ट ने लोगों की धारणा और मानव व्यवहार में बदलाव को भी समस्या के प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है। यानी सिर्फ बंदरों को पकड़ना पर्याप्त नहीं है।
शहरों में कई लोग धार्मिक या मानवीय भावना के कारण बंदरों को खाना खिलाते हैं। लेकिन जब किसी इलाके में लगातार भोजन मिलने लगता है तो बंदर उस जगह को भोजन के भरोसेमंद स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने लगते हैं। इसके बाद बंदरों का इंसानी बस्तियों में आना-जाना बढ़ सकता है। कूड़े और खुले खाद्य पदार्थों की उपलब्धता इस समस्या को और बढ़ाती है। इसलिए विशेषज्ञ दृष्टिकोण से समाधान में कचरा प्रबंधन और अनियंत्रित भोजन उपलब्धता पर रोक भी महत्वपूर्ण है।
यहां स्थिति थोड़ी जटिल है। वन विभाग की वेबसाइट पर 2023-24 तक नसबंदी के आंकड़े उपलब्ध हैं और विभाग कार्यक्रम तथा नसबंदी केंद्रों का उल्लेख करता है। वहीं 2025 की रिपोर्टों में सामने आया था कि वित्तीय सहायता के अभाव में नसबंदी कार्यक्रम प्रभावित हुआ और विभाग ने शिमला नगर निगम से वित्तीय सहयोग की मांग की थी। इससे स्पष्ट है कि नसबंदी की नीति और जमीन पर उसकी नियमित गति—दो अलग मुद्दे हैं। कार्यक्रम को लगातार चलाने के लिए पर्याप्त बजट, बंदरों को पकड़ने की व्यवस्था, पशु चिकित्सा सुविधाएं और केंद्रों का संचालन जरूरी है।
इस समस्या का समाधान एक ही कदम से संभव नहीं दिखता। इसके लिए कई स्तरों पर काम करना होगा।
1. नसबंदी अभियान लगातार चले
बंदरों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए नसबंदी कार्यक्रम को नियमित और वैज्ञानिक तरीके से जारी रखना होगा।
2. शहरों में कचरा प्रबंधन सुधरे
खुले कूड़ेदान और खाने के अवशेष बंदरों को रिहायशी इलाकों की ओर आकर्षित करते हैं। इसलिए कचरा खुले में उपलब्ध न हो, यह महत्वपूर्ण है।
3. बंदरों को खाना खिलाने पर नियंत्रण
रिहायशी इलाकों में बंदरों को खाना खिलाने की आदत पर प्रभावी निगरानी और जागरूकता जरूरी है।
4. हॉटस्पॉट की पहचान
जहां बार-बार हमले हो रहे हैं, वहां अलग से निगरानी और बंदरों को पकड़ने की व्यवस्था की जा सकती है।
5. जंगलों में प्राकृतिक भोजन बढ़ाना
फलदार और स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाने जैसे उपाय बंदरों को प्राकृतिक आवास में भोजन उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं। हिमाचल में पहले भी वन क्षेत्रों में फलदार पौधों को बढ़ावा देने की जरूरत पर जोर दिया गया है।
6. विभागों की जिम्मेदारी स्पष्ट हो
वन विभाग, नगर निकाय और प्रशासन के बीच जिम्मेदारी को लेकर स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है, ताकि शिकायत मिलने पर लोगों को एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय के चक्कर न काटने पड़ें।
आंकड़े बताते हैं कि हिमाचल में बंदरों की कुल संख्या में बड़ी गिरावट आई है। लेकिन लोगों के लिए समस्या सिर्फ कुल संख्या नहीं है। कहां बंदर हैं, उन्हें कितना भोजन मिल रहा है और वे इंसानों के कितने करीब रह रहे हैं—ये बातें भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। इसी वजह से संभव है कि प्रदेश में बंदरों की कुल आबादी घट रही हो, लेकिन कुछ शहरी और ग्रामीण हॉटस्पॉट में लोगों का सामना बंदरों से लगातार होता रहे। शिमला की हालिया घटना इसी विरोधाभास को सामने लाती है—बंदरों की संख्या कम हुई, लेकिन इंसान और बंदर एक-दूसरे के और करीब आ गए। यही वजह है कि हिमाचल में बंदरों की समस्या का समाधान केवल नसबंदी तक सीमित नहीं रखा जा सकता। आबादी नियंत्रण के साथ कचरा प्रबंधन, भोजन उपलब्धता पर नियंत्रण, जागरूकता, हॉटस्पॉट प्रबंधन और विभागीय समन्वय को भी साथ लेकर चलना होगा।
हिमाचल वन विभाग की वेबसाइट पर अभी भी प्रदेश में बंदरों की कुल आबादी के लिए 1,36,443 का आंकड़ा दिया गया है। विभाग के FAQ में इसे 2019 के Monkey Population Estimation का आंकड़ा बताया गया है। लेकिन 2024 में बंदरों की दोबारा राज्यव्यापी गणना कराई गई थी। वन विभाग से जुड़े मई 2024 के दस्तावेज में स्पष्ट है कि 7 मार्च 2024 को प्रदेश स्तर पर रीसस मकाक की नई गणना शुरू की गई थी।
2024 की गणना का क्या हुआ?
यही सबसे महत्वपूर्ण अपडेट है। 2025 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 2024 में हुई बंदरों की गणना की रिपोर्ट वन विभाग ने स्वीकार नहीं की, क्योंकि उसमें सामने आए आंकड़े अपेक्षा से काफी अधिक थे। इसलिए विभाग ने दोबारा बंदरों की गणना कराने का फैसला लिया।