सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज की याचिका, महंत ही रहेंगे दियोटसिद्ध मंदिर की संपत्ति के मालिक
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उत्तर भारत के प्रसिद्ध सिद्धपीठ बाबा बालक नाथ मंदिर का मालिकाना हक मंदिर के महंत श्रीश्रीश्री राजेंद्र गिरी के पास ही रहेगा। सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर से मंदिर ट्रस्ट की संपत्ति से जुड़ी अपील को खारिज कर दिया। इससे पहले इस चर्चित संपत्ति विवाद में 9 मई को जस्टिस एनवी रमना और जस्टिस एस अब्दुल नाजिर की डबल बेंच वाली सर्वोच्च अदालत ने मंदिर ट्रस्ट की अपील को खारिज किया था।
उसके बाद महंत श्रीश्रीश्री 1008 राजेंद्र गिरी महाराज व मंदिर ट्रस्ट के उच्चाधिकारियों में आपसी समझौते की बातें भी सामने आईं थीं। लेकिन समझौते का क्या हुआ यह अभी तक खुलकर सामने नहीं आया है। वहीं, ट्रस्ट ने एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट में मामले को री-स्टोर करने की अर्जी लगाई थी। लेकिन 5 माह का समय बीत जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनुपालना मंदिर ट्रस्ट नहीं करवा पाया।
जिसके चलते अब सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रस्ट की इस अर्जी को खारिज कर दिया है। बीते एक दशक से सुप्रीम कोर्ट में ट्रस्ट बनाम महंत संपत्ति विवाद चला हुआ था। इससे पहले प्रदेश हाईकोर्ट में भी महंतों के पक्ष में फैसला आया था। लेकिन मंदिर ट्रस्ट ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायायल में चुनौती दी थी।
चढ़ावे और खर्च में अंतर पर भी विवाद
वर्ष 1987 को हिमाचल सरकार ने ट्रस्ट का गठन कर दियोटसिद्ध मंदिर की तमाम संपत्ति का अधिग्रहण कर लिया था। जिसमें मंदिर के महंतों की गुरु गद्दी से चली आ रही परपंरागत जमीनों के मालिकाना हक से भी महरूम कर दिया गया। इससे भी एक कदम बढ़कर महंतों को उनके प्राचीन परपंरागत धार्मिक रुतबे से बेदखल कर दिया गया था।
महंतों को ट्रस्ट में स्थान तक नहीं दिया गया था। इस फैसले से नाराज महंतों ने मालिकाना हक के लिए न्यायालय में चुनौती दी। उधर, मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन विशाल शर्मा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बारे में सुना है, लेकिन अभी तक उनके पास ऑर्डर की कॉपी नहीं पहुंची है।
मंदिर ट्रस्ट से प्राप्त होने वाली आमदनी को मंदिर के विकास कार्यों और श्रद्धालुओं की सुविधाओं पर सही तरीके से खर्च नहीं करने पर महंत को आपत्ति थी। अकसर देखा गया है कि चढ़ावे की राशि को मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की बजाय सरकारी वाहनों समेत अन्य पर अधिक खर्च हो रही है। जबकि एक्ट के तहत चढ़ावे को मंदिर पर ही खर्च किया जा सकता है।