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यकीन मानिए, यहां इंसानों संग नाचते हैं देवी देवता

Thu, 22 Oct 2015 09:21 AM IST
Updated Thu, 22 Oct 2015 09:21 AM IST
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kullu dussehra, where god dance with people.

दशहरे के सात दिन यहां सैकड़ों देवी-देवता इंसानों के साथ नाचते हैं। लोगों पर पुलिस नहीं सिर्फ देवताओं की ही वश चलता है। सदियों से ये परंपरा चली है। हम बात कर रहे हैं अतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरे की। देवभूमि हिमाचल के कुल्लू में इंसानों के साथ देवी-देवता भी नृत्य करते हैं। हजारों लोगों की भीड़ को नियंत्रित करने में न पुलिस का वश चलता है और न प्रशासन का।

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खुद देवता ही यहां ट्रैफिक को कंट्रोल करते हैं। विवाद चाहे इंसानों से जुड़ा हो या देवताओं से, देवता ही इसका निपटारा करते हैं। देवताओं की आज्ञा के बिना यहां कुछ नहीं होता। विख्यात अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में देव-मानस मिलन का यह अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। देश-दुनिया में प्रसिद्ध यह धार्मिक एवं सांस्कृतिक महोत्सव वीरवार को रथयात्रा के साथ शुरू होगा।
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ट्रैफिक संभालने का जिम्मा इस देवता के हवाले

kullu dussehra, where god dance with people.

सप्ताह भर चलने वाले महोत्सव में दूरदराज से सैकड़ों देवी-देवता पहुंचते हैं।क्षेत्र के अधिष्ठाता देव रघुनाथ की अगुवाई में होने वाले कुल्लू दशहरा में आज भी अनोखी परंपराओं का निर्वहन होता है। भले ही इस समागम का आयोजन जिला प्रशासन करता हो लेकिन तय सब कुछ देवता करते हैं। रथयात्रा के दौरान यहां ट्रैफिक का जिम्मा देवता धूमल नाग संभालते हैं। धूमल देवता हजारों की भीड़ में रघुनाथजी के रथ के लिए रास्ता बनाते हैं।

तपस्वियों की तरह रहते हैं लोग
कुल्लू दशहरा उत्सव में देवी-देवताओं के रथों के साथ हजारों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। गूर, पुजारियों और बजंतरियों के साथ देवताओं के साथ आए लोग भी यहां शिविरों में तपस्वियों की तरह रहते हैं। देवताओं के शिविर में सप्ताह भर भूमि पर सो कर ये लोग पूरी तरह से ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।

इन्हें मानते हैं देवता का स्वरूप

kullu dussehra, where god dance with people.

देवता के रूप में मूर्ति, मोहरे और सोना-चांदी जड़ित उनके रथ लोग कंधे पर उठाकर लेकर आते हैं। माना जाता है कि देवता जिस तरफ जाना चाहता है, रथ उठाने वाले लोगों को उसी दिशा की ओर मोड़ देता है। मान्यता है कि कंधे पर उठाया रथ भी दैवीय शक्ति से खुद ही हिलता डुलता है। इसे ही देव नृत्य माना जाता है।

कुल्लू दशहरा देव-मानस मिलन का प्रतीक है। यहां इंसानों के साथ देवताओं को नाचते देखा जा सकता है। देवताओं के हर आदेश का लोग पालन करते हैं। ऐसा देव समागम शायद ही कहीं देखने को मिले। - दोतराम ठाकुर, अध्यक्ष जिला देवी-देवता कारदार संघ

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