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किन्नौर हादसा: विशेषज्ञ बोले- अंधाधुंध ब्लास्टिंग से हिल-ढुल गए हिमाचल के पहाड़

Thu, 12 Aug 2021 10:55 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
अमर उजाला नेटवर्क, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Thu, 12 Aug 2021 10:55 AM IST
सार

सतलुज नदी किन्नौर की जीवन रेखा है। इसके बगैर किन्नौर में जीवन असंभव है। वैदिक काल की जीवनदायी शतद्रु (सतलुज) ने कभी सोचा नहीं था कि उसे अंधाधुंध विद्युत दोहन के कारण 150 किलोमीटर में दम घुटकर भूमिगत सुरंगों में बहना पड़ रहा है।

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Kinnaur accident: Expert said that Himachal's mountains were shaken due to indiscriminate blasting
इंजीनियर आरएल जस्टा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अंधाधुंध जल विद्युत दोहन से किन्नौर के पहाड़ दरकने लग गए हैं। जान और माल का नुकसान लगातार बढ़ रहा है। किन्नौर के पहाड़ अति संवेदनशील हैं। भूकंप की दृष्टि से भी यह क्षेत्र सिस्मिक जोन पांच के तहत आता है। इन प्राकृतिक हादसों से सबक लेते हुए किन्नौर को तत्काल ईको सेंसिटिव जोन घोषित किया जाना जरूरी हो गया है। 

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सतलुज नदी किन्नौर की जीवन रेखा है। इसके बगैर किन्नौर में जीवन असंभव है। वैदिक काल की जीवनदायी शतद्रु (सतलुज) ने कभी सोचा नहीं था कि उसे अंधाधुंध विद्युत दोहन के कारण 150 किलोमीटर में दम घुटकर भूमिगत सुरंगों में बहना पड़ रहा है। किन्नौर में सतलुज और उसकी सहायक नदियों पर पहले ही पन बिजली परियोजनाओं का जाल बिछा है। अब कोई भी बिजली परियोजना इस क्षेत्र में नहीं होनी चाहिए। पर्यटन, पर्यावरण और विद्युत दोहन आपस मेें प्रतिपूरक हैं।
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अगर सतलुज में जल सूख जाएगा और घाटियों में हरियाली नहीं होगी तो पर्यटक टूटते पहाड़ोें पर क्यों आएंगे। हमें नार्वे और स्वीडन की तर्ज पर कम से कम 20 प्रतिशत विद्युत क्षमता क्षेत्र को पर्यावरण सुरक्षा के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। सतलुज पर दो प्रोजेक्टों के बीच दूरी का तय करना भी बहुत जरूरी है, अन्यथा भावी पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी। किन्नौर में इन प्राकृतिक  विपदाओं का मुख्य कारण पन बिजली परियोजनाओं के लिए की गई अंधाधुंध ब्लास्टिंग ही है।
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किन्नौर के ये पहाड़ कच्चे, खुरदरे और संवेदनशील हैं। इस कारण ये अपनी वास्तविक अवस्था से हिल-ढुल गए हैं। पन बिजली परियोजनाओं के बारे में शुक्ला कमेटी की रिपोर्ट को सरकार को ठंडे बस्ते से निकाल लेना चाहिए। उस पर सरकार को अमल करना चाहिए। इस रिपोर्ट के मुताबिक ट्री लाइन से ऊपर कोई भी पन विद्युत परियोजनाएं नहीं बननी चाहिए। प्रोजेक्टों के बीच में भी एक निश्चित दूरी होनी चाहिए। 
- लेखक : इंजीनियर आरएल जस्टा, पन बिजली विशेषज्ञ और बिजली बोर्ड से सेवानिवृत्त अतिरिक्त अधीक्षक अभियंता।    

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