आरएंडपी के तहत ही की जाए जूनियर आफिस असिस्टेंट भर्तीः हाईकोर्ट
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जूनियर ऑफिस असिस्टेंट की भर्ती में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इन पदों पर नियुक्ति भर्ती एवं पदोन्नति नियमों (आरएंडपी) के अनुरूप ही होगी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ ने अक्षय शर्मा व अन्यों द्वारा दायर याचिका की सुनवाई में स्पष्ट किया कि हिमाचल सरकार द्वारा 19 मार्च 2018 को जारी पत्राचार का औचित्य नहीं रह जाता, विशेषतया जब इन पदों को भरने के लिए पहले ही नियम बनाए हैं।
याचिका में आरोप लगाया था कि पदों को आरएंडपी नियमों के विपरीत भरा जा रहा है। प्रार्थियों की ओर से न्यायालय के समक्ष दलील दी गई थी कि सरकार की ओर से 19 मार्च को जारी पत्राचार आरएंडपी नियमों के विपरीत है। ऐसे में सरकार को आदेश दें कि इन पदों पर नियुक्ति केवल नियमों के तहत हो। प्रशासनिक प्राधिकरण ने 16 अगस्त 2018 को पारित अपने अंतरिम आदेशों के तहत प्रार्थियों के लिए 15 पद रिक्त रखने के आदेश पारित किए थे।
कहा था कि भर्ती प्राधिकरण द्वारा सुनाए जाने वाले अंतिम फैसले पर निर्भर करेगी। इसके अतिरिक्त प्राधिकरण ने कर्मचारी चयन आयोग को यह छूट दी थी कि वह इन पदों के लिए हुई भर्ती प्रक्रिया का परिणाम घोषित कर दे। प्रार्थियों की ओर से प्राधिकरण के आदेश को याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई थी।
आईजीएमसी के एमएस की नियुक्ति पर मांगा स्पष्टीकरण
प्रदेश हाईकोर्ट में चल रहे दागी अधिकारियों को संवेदनशील पदों से हटाने से जुड़े मामले में बताया गया कि आईजीएमसी शिमला में न्यूरो सर्जन की बतौर मेडिकल सुपरिंटेंडेंट तैनाती न तो जनहित में सही है और न ही मरीजों के। इनकी तैनाती के बाद से आईजीएमसी में अव्यवस्था का माहौल पैदा हो गया है।
एक डॉक्टर जिस पर सीनियर मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की मोहर के तहत फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्र जारी करने का आरोप है। उसके खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं की जा रही है। वैसे भी सर्जन जो सुपर स्पेशिएलिटी में माहिर होते हैं, उनकी तैनाती बतौर एमएस न तो मरीजों के हित में होती है और न ही जनहित में।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश संदीप शर्मा की खंडपीठ ने स्वास्थ्य सचिव को आदेश दिए कि वह 2 सप्ताह के भीतर अपने निजी शपथपत्र से इसका स्पष्टीकरण दे। मामले पर सुनवाई 27 सितंबर को होगी।