पिता की नसीहत पर टूटने से बच गए थे जेपी नड्डा, पढ़ें पूरा मामला
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जेपी नड्डा के पिता एवं पूर्व कुलपति रांची विश्वविद्यालय नारायण लाल नड्डा ने कहा कि उनके बेटे को कितना बड़ा पद मिला है, यह नहीं बल्कि परफॉरमेंस महत्व रखती है। पद तो कुछ समय और साल के लिए होता है।
व्यक्ति की पहचान उसके द्वारा किए गए कार्य और कड़ी मेहनत से होती है। उन्होंने कहा कि जेपी, 2003 में विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद काफी तनाव में थे। वह दिल्ली चले जाना चाहते थे।
लेकिन मैंने उन्हें यह बोल कर दिल्ली नहीं जाने दिया कि हारकर नहीं, जीत कर जाना है। इसके बाद जीते और राज्य सरकार में मंत्री बने। फिर बीच में ही संगठन में काम करने दिल्ली गए।
बिलासपुर के विजयपुर स्थित उनके निवास स्थान पर अमर उजाला से विशेष बातचीत में नारायण लाल नड्डा ने कहा कि उनका परिवार बहुत पहले से भाजपा से जुड़ा है। इस कारण नड्डा भी बाल्यकाल से ही छात्र संगठन के साथ जुड़ गए।
फोन पर बधाई देने वालों का लगा तांता
जेपी के दादा के देहांत के बाद 1979 में नड्डा पटना से बिलासपुर लौट आए। यहां वह छात्र संगठन से होते हुए आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं। मेहनत के बाद जल्द ही उन्हें स्थायी अध्यक्ष का जिम्मा भी मिल सकता है।
उन्होंने कहा कि बुरा दौर अब पीछे रह गया है। अब पार्टी ने उनके काम को देखते हुए जो सम्मान दिया, उससे आज उन्हें गर्व महसूस हो रहा है। एक सवाल के जवाब में नारायण लाल ने कहा कि नड्डा द्वारा जो योजनाएं लाई गई थीं, वह तय समय में पूरी होंगी।
जगत प्रकाश नड्डा के घर किसी प्रकार की चहल-पहल नहीं है, लेकिन फोन पर पिता नारायण लाल नड्डा को प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों से भी लोग बधाई दे रहे हैं।