‘अमर उजाला’ से विशेष बातचीत में राज्यपाल ने कही खास बात
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एक माह पहले ही पदभार संभालने वाले हिमाचल के नए राज्यपाल देवव्रत आचार्य राजभवन शिमला और इसकी कार्यशैली का स्वरूप बदलते नजर आ रहे हैं। राज्यपाल नशाखोरी, स्वच्छता, जैविक कृषि और छुआछूत आदि विषयों पर प्रदेशव्यापी अभियान चलाना चाहते हैं।
इसके लिए वह शासन-प्रशासन को हर स्तर पर संवेदनशील बनाना चाहते हैं। एक राज्यस्तरीय बैठक के बाद उन्होंने जिला स्तर पर खुद जाकर मासिक बैठकों का भी प्लान बना दिया है। ‘अमर उजाला’ के वरिष्ठ संवाददाता सुरेश शांडिल्य ने उनसे शनिवार को राजभवन शिमला में विशेष बातचीत की। पेश हैं बातचीत के अंश:
सवाल- हिमाचल के तमाम राज्यपालों की बात करें तो आपका व्यक्तित्व सबसे हटकर माना जा रहा है। क्या आप लीक से हटकर चल रहे हैं?
जवाब: मैं यहां सुखोपभोग के लिए नहीं आया हूं। अगर मैं ऐसा कर रहा हूं तो संविधान का विरोध कहां हो रहा है। मैं संवैधानिक पद पर हूं। नशाखोरी के खिलाफ बात करना, स्वच्छता का मुद्दा उठाना, ये संविधान के अनुरूप ही तो हैं। संविधान का रक्षक होते हुए छुई-मुई बनकर कोई राजभवन से बाहर न निकले और भलाई के काम न करे। ये कैसी बात है? मैं छुई-मुई बनकर बैठा रहूं, ये मेरा अभीष्ट नहीं।
सवाल: नशाखोरी, स्वच्छता और जैविक खेती के अलावा आप चौथे विषय छुआछूत के खिलाफ अभियान पर फोकस कर रहे हैं। इसमें आप क्या करेंगे?
जवाब: हिमाचल को छुआछूत की कुरीति से मुक्त कराना होगा। मैं खुद उन लोगों के बीच बैठकर खाना खाने जाऊं गा, जो इस सामाजिक बुराई के शिकार हैं।
इन्हें आदर्श मानते हैं राज्यपाल
सवाल: आप अपना आदर्श किसे मानते हैं और किनसे प्रेरणा लेकर यह सब कर रहे हैं?
जवाब: मेरे लिए आदर्श हर वो व्यक्ति है, जिसने समाज के हर वर्ग के लोगों के लिए काम किया। समाज सुधार के लिए जो उचित होगा, वही करूंगा।
सवाल: आपने संस्कृत भाषा में ही शपथ ली। आप संस्कृत को प्रोत्साहन देने की बात करते हैं। क्या गुरुकुल से जुड़ाव के कारण ही ऐसा है?
जवाब: संस्कृत भाषा को मैं धर्म से नहीं जोड़ता। संस्कृत के भीतर हमारे देश की सारी संस्कृति छिपी है। वेद, दर्शन, उपनिषद, गीता ये सब संस्कृत में ही हैं। संस्कृत में जो ज्ञान का भंडार है, वह पढ़ने वाले को संस्कारित करता है। वेदों में लिखा है -‘अनन्यो अन्यं अभिहरयत: वत्सं जातं मिवाघ्न्या’ अर्थात् जैसे गाय अपने नवजात बछडे़ पर लगा मल चाटकर प्रसव वेदना भूल जाती है, वैसे ही हम एक-दूसरे से प्यार करें।
हिमाचल की देव संस्कृति पर भी बोले राज्यपाल
सवाल: हिमाचल की देव संस्कृति पर क्या कहते हैं?
जवाब: बहुत ही अच्छी! पर यहां कई जगहों पर बलि प्रथा है, यह अंधविश्वास है। खैर, अब तो हाई कोर्ट ने भी इस पर संज्ञान ले लिया है। विज्ञान प्रमाणित कर चुका है कि मांस मनुष्य का भोजन नहीं।
सवाल: आप राजभवन में हवन कुंड बना रहे हैं और देसी गाय को यहां लाना चाहते हैं। कब तक ऐसा हो जाएगा?
जवाब: देखिए! मेरी दिनचर्या जैसी गुरुकुल में थी, वैसी ही यहां भी है। रोज सुबह चार बजे उठता हूं। एक घंटे स्टडी करता हूं। स्नान करके हवन करता हूं। गाय को ग्रास देता हूं। ये वहां भी करता था और अब यहां भी। यहां परिसर में किसी जमाने में कोई मद्यशाला होती थी, वहीं पूरे विधान से हवनकुंड बना रहे हैं। किसी देसी पहाड़ी गाय की खोज कर रहा हूं।
सवाल: और क्या कहते हैं?
जवाब: मैं किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहता। मुझे राजनीति करनी नहीं आती। मेरी राजनीति की पृष्ठभूमि ही नहीं। सच्चे मन से देवभूमि हिमाचल की सेवा करना चाहता हूं। इसी में हिमाचल की जनता का भी सहयोग चाहता हूं।