फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Shimla News ›   Special tradition Chamba Minjar fair cultural evening is seen sitting on the ground

International Minjar Fair: नेता हो या जनता, जमीन पर बैठकर देखते हैं सांस्कृतिक संध्या

Wed, 31 Jul 2024 09:40 PM IST
अंकेश डोगरा संवाद न्यूज एजेंसी, चंबा।
संवाद न्यूज एजेंसी, चंबा। Published by: अंकेश डोगरा Updated Wed, 31 Jul 2024 09:40 PM IST
सार

अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले में सात रंगारंग सांस्कृतिक संध्याओं में एक खास परंपरा का पालन किया जाता है और ये रिवायत आज भी जारी है। पढ़ें विस्तार से...

विज्ञापन
Special tradition Chamba Minjar fair cultural evening is seen sitting on the ground
नेता हो या जनता, जमीन पर बैठकर देखते हैं सांस्कृतिक संध्या - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले में हर खासोआम जमीन पर बैठकर सांस्कृतिक संध्या देखने की रिवायत आज भी जारी है। मुख्यातिथि से लेकर दर्शक दीर्घा में सभी लोग जमीन पर बैठकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का लुत्फ उठाते हैं। मिंजर मेले की यही रिवायत इसे प्रदेश भर में होने वाले दूसरे मेलों से अलग करती है। मिंजर मेले की सात रंगारंग सांस्कृतिक संध्याओं में इसी परंपरा का पालन किया जाता है।

विज्ञापन


प्रदेश के दूसरे मेलों की सांस्कृतिक संध्याओं में बैठने के लिए कुर्सियों का प्रबंध होता है। मंडी की मशहूर अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि में दर्शक सांस्कृतिक संध्याओं का लुत्फ कुर्सियों पर बैठ कर उठाते हैं। कुल्लू के शिवरात्रि मेले में कलाकेंद्र में विशिष्ट अतिथि और अन्य दर्शक सोफे और कुर्सियों पर बैठ कर इसका आनंद उठाते हैं।
विज्ञापन


राजा साहिल बर्मन की जीत की खुशी में मनाया मेला
अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले का आगाज 10वीं शताब्दी में चंबा के राजा साहिल बर्मन के शासनकाल में हुआ था। राजा साहिल बर्मन कुरुक्षेत्र में युद्ध जीत कर आए थे। इस दौरान चंबा वासियों ने राजा को मक्की, धान व जौ की फसलें भेंट कर उनका स्वागत किया। इसके बाद हर वर्ष इसी दिन मिंजर मेले का आयोजन होता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


पद्मश्री विजय शर्मा ने बताया कि मिंजर मेले की यह खास रिवायत आरंभ से ही चली हुई है। सांस्कृतिक संध्याओं में मुख्यातिथि दीर्घा से लेकर अन्य दीर्घाओं में दर्शक बैठकर मेले की सांस्कृतिक संध्याओं का लुत्फ उठाते हैं। दसवीं शताब्दी में राजा साहिल बर्मन के समय में मिंजर मेला आरंभ हुआ था। उस दौरान यह मेला तीन दिनों का था। मंदिर में मिंजर चढ़ाने से मिंजर मेला शुरू होता था। लोग नाहर सिंह मंदिर में मेला मनाते थे। तीन दिनों में से दो दिन भोजड़ी होती थी।

इस दौरान लोग घरों से विभिन्न पकवान बनाकर ले जाते थे और टाले पर एकत्रित होकर खाते थे। मिंजर विसर्जन के समय राज परिवार की महिलाएं ऐतिहासिक चामुंडा माता मंदिर से इसका नजारा देखती थी। सन 1947 में देश आजाद हुआ। वर्ष 1962 में मिंजर का झंडा बनाया गया जिसे तत्कालीन जिलाधीश द्वारा फहराया गया था। मिंजर मेले के आयोजन का जिम्मा नप चंबा को मिलने के बाद से ही सांस्कृतिक संध्याओं का आयोजन किया जाने लगा।


प्रबुद्ध नागरिक पीसी ओबराय ने बताया कि मिंजर मेला मेल-जोल का है। इसी मेल जोल का प्रमाण है कि सांस्कृतिक संध्याओं में पहुंचने वाली विशेष हस्तियों से लेकर आम दर्शक नीचे बैठते हैं।

वरिष्ठ नागरिक यादवेंद्र चौणा ने बताया कि मिंजर मेला ने बताया कि जब मिंजर मेले के आयोजन का जिम्मा नप प्रशासन और जिला प्रशासन के पास आया तब से ही सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ये चंबा के लोगों के लिए गौरव की बात है कि लोग एक ही दीर्घा में नीचे बैठ कर इसका लुत्फ उठाते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed