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प्रशासन को 16 दिन पहले मिल चुकी थी जमीन धंसने की सूचना
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बंदोबस्त के नाम पर भेजा था सिर्फ तिरपाल, कच्चीघाटी में जमीन धंसने का मामला
क्रॉसर
भवन ढहने के मामले में बड़ी लापरवाही
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। राजधानी में आपदा से निपटने के प्रबंधों पर प्रशासन लाखों रुपये बहा रहा है, लेकिन जब आपदा आई तो महज एक तिरपाल देकर पल्ला झाड़ लिया। कच्चीघाटी वार्ड के घोड़ाचौकी इलाके में 30 सितंबर को हुए भूस्खलन और भवन ढहने के घटनाक्रम में जिला प्रशासन और नगर निगम की बड़ी लापरवाही सामने आई है।
जमीन धंसने और भवनों में दरारें पड़ने की लिखित सूचना जिला प्रशासन और नगर निगम को 14 सितंबर को मिल चुकी थी। लेकिन तुरंत राहत कार्य शुरू करने और भवनों में दरारें पड़ने के कारणों का पता लगाने के बजाय प्रशासन ने मदद के नाम पर सिर्फ एक तिरपाल भेजा। 30 सितंबर को ढहे सात मंजिला भवन के निचली ओर बने दो मंजिला भवन में रहने वाली महिला कर्मचारी निर्मला भट्ठ के मकान में 13 सितंबर को ही दरारें पड़नी शुरू हो गईं थीं। यह दरारें बढ़ने लगी तो महिला कर्मी ने इसकी सूचना पटवारी को दी। पटवारी ने 14 सितंबर को मौके का निरीक्षण किया और मकान खाली करने को कहा। इसी दिन महिला कर्मी ने इसकी लिखित शिकायत जिला प्रशासन और नगर निगम को दी।
शिकायत में लिखा कि उनके भवन में दरारें पड़ रही हैं। जमीन भी धंस रही है। ऐसे में जांच के लिए अफसरों को मौके पर भेजा जाए ताकि जान और माल का नुकसान न हो। बाकायदा फोटो भी शिकायत के साथ दिए। महिला कर्मी के अनुसार जिला प्रशासन और नगर निगम से कोई अफसर मौके पर जांच करने नहीं आया। 15 सितंबर को जिला प्रशासन ने पटवारी के जरिये एक तिरपाल भेजा जो धंस रहे हिस्से पर लगाया। स्थानीय पार्षद संजय परमार को सूचना दी तो निगम के एक कनिष्ठ अभियंता मौके पर आए और बिना कुछ कहे चले गए।
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तो बच सकती थी लाखों की संपत्ति
जिला प्रशासन और नगर निगम यदि शिकायत को गंभीरता से लेते और मौके पर अधिकारियों को भेजते तो लाखों रुपये की संपत्ति को बचाया जा सकता था। जांच से पता चला कि इस पूरी पहाड़ी पर बने भवनों में दरारें पड़ रही हैं और जमीन धंस रही है। लेकिन न कोई मौके पर आया और न ही कोई जांच हुई। भवन मालिक के अनुसार 15 सितंबर के बाद जमीन धीरे-धीरे धंसती रही। 25 सितंबर के बाद हुई भारी बारिश से यहां भूस्खलन ज्यादा हो गया। भवन मालिकों ने कहा कि भारी बारिश के चलते एनएच का पानी भी इस एरिया में बहता रहा। यदि सूचना मिलते ही जांच हो जाती तो कम से कम भारी बारिश से पहले ड्रेनेज सिस्टम तो सुधारा जा सकता था। यहां तिरपाल लगाए जा सकते थे। यही नहीं, इन 15 दिनों में भवन मालिक अपने मकान खाली कर सारा सामान तो बाहर निकाल सकते थे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। ज्यादातर लोगों ने मकान तो खाली किए लेकिन सामान नहीं निकाला। एमसी आयुक्त आशीष कोहली ने कहा कि इस मामले में लिखित शिकायत की सूचना नहीं है। सूचना मिलते ही अनसेफ भवन खाली करवा दिए थे।
सूचना पर तुरंत की थी कार्रवाई
इस मामले में लिखित शिकायत मिलने की बात ध्यान में नहीं है, लेकिन जैसे ही सूचना मिली थी तो असुरक्षित भवन को खाली करवाया गया ताकि कोई जानी नुकसान न हो। तिरपाल भी लगवाए गए ताकि पानी न रिसे। जो जरूरी कदम थे, प्रशासन ने उठाए हैं।
-बीआर शर्मा, एसडीएम ग्रामीण
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क्रॉसर
भवन ढहने के मामले में बड़ी लापरवाही
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। राजधानी में आपदा से निपटने के प्रबंधों पर प्रशासन लाखों रुपये बहा रहा है, लेकिन जब आपदा आई तो महज एक तिरपाल देकर पल्ला झाड़ लिया। कच्चीघाटी वार्ड के घोड़ाचौकी इलाके में 30 सितंबर को हुए भूस्खलन और भवन ढहने के घटनाक्रम में जिला प्रशासन और नगर निगम की बड़ी लापरवाही सामने आई है।
जमीन धंसने और भवनों में दरारें पड़ने की लिखित सूचना जिला प्रशासन और नगर निगम को 14 सितंबर को मिल चुकी थी। लेकिन तुरंत राहत कार्य शुरू करने और भवनों में दरारें पड़ने के कारणों का पता लगाने के बजाय प्रशासन ने मदद के नाम पर सिर्फ एक तिरपाल भेजा। 30 सितंबर को ढहे सात मंजिला भवन के निचली ओर बने दो मंजिला भवन में रहने वाली महिला कर्मचारी निर्मला भट्ठ के मकान में 13 सितंबर को ही दरारें पड़नी शुरू हो गईं थीं। यह दरारें बढ़ने लगी तो महिला कर्मी ने इसकी सूचना पटवारी को दी। पटवारी ने 14 सितंबर को मौके का निरीक्षण किया और मकान खाली करने को कहा। इसी दिन महिला कर्मी ने इसकी लिखित शिकायत जिला प्रशासन और नगर निगम को दी।
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शिकायत में लिखा कि उनके भवन में दरारें पड़ रही हैं। जमीन भी धंस रही है। ऐसे में जांच के लिए अफसरों को मौके पर भेजा जाए ताकि जान और माल का नुकसान न हो। बाकायदा फोटो भी शिकायत के साथ दिए। महिला कर्मी के अनुसार जिला प्रशासन और नगर निगम से कोई अफसर मौके पर जांच करने नहीं आया। 15 सितंबर को जिला प्रशासन ने पटवारी के जरिये एक तिरपाल भेजा जो धंस रहे हिस्से पर लगाया। स्थानीय पार्षद संजय परमार को सूचना दी तो निगम के एक कनिष्ठ अभियंता मौके पर आए और बिना कुछ कहे चले गए।
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तो बच सकती थी लाखों की संपत्ति
जिला प्रशासन और नगर निगम यदि शिकायत को गंभीरता से लेते और मौके पर अधिकारियों को भेजते तो लाखों रुपये की संपत्ति को बचाया जा सकता था। जांच से पता चला कि इस पूरी पहाड़ी पर बने भवनों में दरारें पड़ रही हैं और जमीन धंस रही है। लेकिन न कोई मौके पर आया और न ही कोई जांच हुई। भवन मालिक के अनुसार 15 सितंबर के बाद जमीन धीरे-धीरे धंसती रही। 25 सितंबर के बाद हुई भारी बारिश से यहां भूस्खलन ज्यादा हो गया। भवन मालिकों ने कहा कि भारी बारिश के चलते एनएच का पानी भी इस एरिया में बहता रहा। यदि सूचना मिलते ही जांच हो जाती तो कम से कम भारी बारिश से पहले ड्रेनेज सिस्टम तो सुधारा जा सकता था। यहां तिरपाल लगाए जा सकते थे। यही नहीं, इन 15 दिनों में भवन मालिक अपने मकान खाली कर सारा सामान तो बाहर निकाल सकते थे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। ज्यादातर लोगों ने मकान तो खाली किए लेकिन सामान नहीं निकाला। एमसी आयुक्त आशीष कोहली ने कहा कि इस मामले में लिखित शिकायत की सूचना नहीं है। सूचना मिलते ही अनसेफ भवन खाली करवा दिए थे।
सूचना पर तुरंत की थी कार्रवाई
इस मामले में लिखित शिकायत मिलने की बात ध्यान में नहीं है, लेकिन जैसे ही सूचना मिली थी तो असुरक्षित भवन को खाली करवाया गया ताकि कोई जानी नुकसान न हो। तिरपाल भी लगवाए गए ताकि पानी न रिसे। जो जरूरी कदम थे, प्रशासन ने उठाए हैं।
-बीआर शर्मा, एसडीएम ग्रामीण