HP Politics: हिमाचल में माकपा का समर्थन लेकर कांग्रेस का भाजपा के खिलाफ मोर्चा
भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन (इंडिया-गठबंधन) की झलक सोमवार को शिमला के चौड़ा मैदान में हुई कांग्रेस की रैली में दिखी।
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भाजपा के खिलाफ माकपा के खुले सहयोग से प्रदेश में कांग्रेस का नया मोर्चा सामने आया है। लोकसभा चुनाव में माकपा नेताओं ने पहली बार कांग्रेस के साथ मंच शेयर किया। इससे पहले माकपा ने कांग्रेस को इतना खुला समर्थन कभी नहीं दिया। इस तरह से भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन (इंडिया-गठबंधन) की झलक सोमवार को शिमला के चौड़ा मैदान में हुई कांग्रेस की रैली में दिखी। लाल झंडा उठाए सैकड़ों माकपा कार्यकर्ता कांग्रेस प्रत्याशी विनोद के पक्ष में उतर आए।
यही नहीं, राकेश सिंघा सहित माकपा के प्रदेश सचिव डॉ. ओंकार शाद, नगर निगम के पूर्व मेयर और शिमला से विधानसभा उम्मीदवार रह चुके संजय चौहान, कसुम्पटी हलके से माकपा के पूर्व प्रत्याशी रहे कुलदीप तंवर, मजदूर संगठन सीटू के प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा जैसे प्रमुख नेताओं को भी सम्मानपूर्वक मंच पर बैठाया गया। उल्लेखनीय है कि इस बार संसदीय चुनाव के लिए माकपा हिमाचल में कोई उम्मीदवार नहीं दे रही है। माकपा ने 1996 और 2014 मेंं शिमला से भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ प्रत्याशी दिया था।
मंडी से तो लगभग हर बार दोनों दलों के खिलाफ उम्मीदवार देती आई है। अलग-अलग चुनाव में मंडी से डॉ. ओंकार शाद, कुशाल भारद्वाज और दलीप कायथ जैसे नेता चुनाव लड़ते आए हैं। यह अलग बात है कि लोस चुनाव में वाम विचारधारा कभी भी अपना खाता नहीं खोल पाई। वाम नेता विजेंद्र मेहरा का कहना है कि माकपा का लक्ष्य तानाशाह हो चुकी को हराने का है, इसलिए कांग्रेस को चारों सीटों पर खुला समर्थन दिया जा रहा है।
राज्य में हुए विधानसभा चुनाव की बात करें तो 1962 में जोगिंद्रनगर से सीपीआई के ताराचंद को टेरिटोरियल काउंसिल के लिए सदस्य चुना गया था। बल्ह से माकपा के तुलसीराम 1972 में विधायक बने थे। राकेश सिंघा पहले शिमला से 1993 में विधायक बने और उसके बाद 2017 में ठियोग विधानसभा हलके से विधायक चुने गए। विनोद सुल्तानपुरी के नामांकन के बाद कांग्रेस और माकपा की इस नई व्यूह रचना की सोमवार को खासी चर्चा रही।
मंडी सीट पर लगातार तीन चुनाव लड़े, इस बार कांग्रेस को समर्थन
2019 में माकपा ने मंडी लोकसभा सीट पर दलीप कायथ को प्रत्याशी दिया था। कायथ ने 14838 वोट लिए थे, जो कुल मतों के 1.57 फीसदी थे। रामस्वरूप शर्मा 68.62 फीसदी मत लेकर जीते थे जबकि कांग्रेस के आश्रय शर्मा 25.63 फीसदी वोट लेकर चुनाव हार गए थे। कुल 17 उम्मीदवारों में से माकपा यहां कांग्रेस और भाजपा के बाद वोट लेने के मामले में तीसरे स्थान पर रही। माकपा ने भी 2014 में कुशाल भारद्वाज को उम्मीदवार दिया था और उन्हें 1.92फीसदी मत पड़े। भाजपा के रामस्वरूप शर्मा 49.94 फीसदी मतों से चुनाव जीते, जबकि प्रतिभा सिंह को 44.46 फीसदी मत पड़े थे। वर्ष 2009 में मंडी से माकपा के प्रत्याशी ओंकार शाद को 20664 वोट मिले थे, जो कुल मतों के 2.9 फीसदी थे। कांग्रेस प्रत्याशी वीरभद्र सिंह को 47.81 फीसदी मत लेकर विजयी हुए, जबकि भाजपा के महेश्वर सिंह को 45.85 फीसदी वोट पड़े थे।
शिमला सीट पर 2014 में भी लड़ा चुनाव, 1.55 फीसदी वोट लिए
शिमला लोकसभा सीट पर वर्ष 2014 में भी माकपा ने चुनाव लड़ा था। यहां से जगत राम को प्रत्याशी बनाया था। उस वक्त जगत राम को 11434 मत पड़े, जो कि कुल मतों के 1.55 फीसदीथे। भाजपा प्रत्याशी सुरेश कश्यप को 52.3 फीसदी और कांग्रेस प्रत्याशी मोहन लाल ब्राक्टा को 40.89 फीसदी मत पड़े थे।