पत्थर तोड़े, सब्जी भी बेची, पर आवाज ने दी सुनील राणा को पहचान
गद्दियाली नॉन स्टॉप नाटी और ‘नकटी’ से पहचान बनाने वाले सुनील राणा ने कभी सब्जी बेची तो कभी पत्थर भी तोड़े। आर्थिक स्थिति खराब होने पर जमा दो के बाद स्कूल छोड़ दिया था। लेकिन, आवाज ने दिलाई मंजिल। जी हां, हाल ही में उनकी वीडियो ‘नकटी’ को 11 लाख लोगों ने यू-ट्यब पर देखा है, जबकि गद्दियाली नॉन स्टॉप नाटी को तीन मिलियन व्यूज मिले हैं।
साल 2005 से 2018 तक एक दर्जन से अधिक एलबम में 100 से अधिक गीत गा चुके सुनील ने गद्दी समुदाय के विलुप्त होते नुआला (शिव पूजा परंपरा) को भी संजीवनी दी है। साल 2007 में वह अमर उजाला हिमाचल की आवाज के भी विजेता बने हैं। पिता किशन लाल खेतीबाड़ी का काम करते हैं, माता कमला देवी गृहिणी हैं।
घर में आर्थिक तौर पर मदद करने और कॉलेज की फीस के लिए छुट्टियों के दिनों में पत्थर भी तोड़े और बेल्डिंग का काम भी किया। स्कूल छोड़ने के बाद डल झील के समीप 1997 से 1998 तक करीब एक साल सब्जी की दुकान की।
इसी बीच उनके मन में ख्याल आया, क्या मैं इस काम के लिए पैदा हुआ हूं? मुझे तो गायक बनना है। क्योंकि, गाने का शौक तो बचपन से ही था। लेकिन स्कूल के दिनों में मन में झिझक के चलते कभी मंच की सीढ़ी तक नहीं चढ़ी थी।
सुनील पर बनीं चार डॉक्यूमेंटरी
साल 1998 में धर्मशाला महाविद्यालय में प्रवेश पाया। वहीं से संगीत की भी शुरुआत हुई। इसके बाद 2000 में ऑल इंडिया रेडियो का ऑडिशन दिया, जिसमें सफलता मिली।
वहीं कॉलेज की पढ़ाई के बाद दो साल प्राइवेट नौकरी की।
हालांकि, साल 2005 से 2018 तक गद्दी ऐंचली की लोक रामायण, परंपरा, प्रथा, हुसन पहाड़ां दा, महक माटी की, गद्दी विरासत और शिव विवाह जैसी एलबम मार्केट में आईं। लेकिन, इससे घर नहीं चल सकता था। इसलिए अभी भी गायकी के साथ इंश्योरेंस सेक्टर में काम करते हैं। उन्होंने कहा कि उनके गुरु रहे डॉ. सतीश ठाकुर, पंडित सुरेश लंघा और सुरेश कपूर का उन्हें हमेशा सहयोग मिला है।
सुनील राणा के जीवन पर अब तक चार डॉक्यूमेंटरी फिल्में बनी हैं, जिसमें एक का प्रसारण सिंगापुर में भी हुआ। इसके बाद सुनील को सिंगापुर में लाइव परफारमेंस के लिए आमंत्रित किया गया था। वहीं सुनील राणा पहले हिमाचल के लोक कलाकार हैं, जिन्होंने टेडेक्स टॉक किया है।
राणा का मानना है कि सरकार लोक संस्कृति के संरक्षण की बात करती है। लेकिन, कलाकारों का संरक्षण किसी ने नहीं किया। यदि कलाकारों का संरक्षण होगा, तो संस्कृति स्वयं ही संरक्षित हो जाएगी।