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सिलाई के साथ गाती रहीं गाने, आज लोगों के दिलों में छाया किरण का जादू

Mon, 05 Aug 2019 10:46 AM IST
अरविन्द ठाकुर राकेश भारद्वाज, अमर उजाला, धर्मशाला
राकेश भारद्वाज, अमर उजाला, धर्मशाला Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Mon, 05 Aug 2019 10:46 AM IST
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himachali folk singer kiran chauhan success story dharamshala himachal pradesh
- फोटो : अमर उजाला

गरीबी और लोगों के ताने भी किरण चौहान की राह नहीं रोक पाए। लोक कलाकार किरण ने घर की खराब आर्थिक स्थिति से निपटने के लिए सिलाई का काम सीखने के साथ लोकगायकी के अपने सपने को भी जिंदा रखा। उनके गाए चार लोकगीतों करा चाला छोरुआ, लागा रे लागा, रिमझिमझिम और धुआं बोला पर आधारित एलबम को यू-ट्यूब पर तीन लाख 17 हजार से अधिक लोगों ने देखा है। कन्या भ्रूण हत्या पर आधारित सुणा ओ सखी सहेलियों गीत भी काफी पसंद किया गया है। 

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किरण शिमला जिले के रोहडू से संबंध रखती हैं। इन्हें बचपन से ही गाने का शौक है। स्कूल समय में भी राज्य स्तर पर एकल लोक गायन प्रतियोगिता में हमेशा दूसरे और तीसरे स्थान पर रहीं। साल 2013 में पहला गाना हीर-रांझा और 2014 में ओ साजना मार्केट में आया। 2015 में चिंगारी एलबम आई। चार लोक गीतों करा चाला छोरुआ, लागा रे लागा, रिमझिमझिम और धुंआ बोला पर आधारित एलबम काफी हिट रही।
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सहेली और ओ साजना को 50 हजार लोगों ने यू-ट्यूब पर देखा है। इनका अगले माह चिंगारी-2 ऑडियो भी लांच होने वाला है। इसमें रोहडू, रामपुर और निचले हिमाचल सहित उत्तराखंड की संस्कृति के दर्शन होंगे। किरण ने उत्तराखंड सहित चंबा में मिंजर, मंडी में शिवरात्रि, बैजनाथ में शिवरात्रि, रोहडू, केलांग, काजा, सुजानपुर, हमीरपुर, पालमपुर, रेणुकाजी, रिकांगपियो और रामपुर लवी मेलों में प्रस्तुतियां दे चुकी हैं।

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किरण ने बताया कि पिता बलदेव चौहान किसान और माता प्रभा चौहान गृहिणी हैं। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। ज्यादा बीमार रहती थीं। ऐसे में जमा दो के आगे पढ़ाई नहीं कर पाईं। जमा दो के बाद सिलाई का काम सीखा। गाने के शौक को भी जारी रखा।

अभी वह दुकान में सिलाई का काम करने के साथ गाना भी गाती हैं। किरण की बड़ी बहन प्रियंका की शादी हो गई है, जबकि रोहित छोटा भाई है। किरण कहती हैं कि यदि हम हिंदी और पंजाबी के पीछे भागते रहे तो हमारे लोक गीत विलुप्त हो जाएंगे। अपनी संस्कृति को बचाने के लिए युवाओं को आगे आना चाहिए। सरकार को भी सहयोग करना चाहिए।

बेटी को गीत-संगीत में न भेजने की बात करते थे लोग 
लड़की को गीत-संगीत में न डालने की लोगों की बातें सुनकर कभी-कभी माता-पिता किरण को गाना छोड़ने के लिए बोलते थे। किरण के समझाने पर वह मान जाते और माता-पिता ने किरण को आगे बढ़ने में हमेशा उसका साथ दिया। माता-पिता के अलावा सुमित नारायण, संगीत निदेशक प्रभु नेगी और सिंगर बबलू ने भी उनका सहयोग किया। बबलू ही किरण के लिए गाने लिखते हैं।

मां को गुनगुनाते सीखा गाना
किरण चौहान को रोहडू में कोई गाना सिखाने वाला नहीं था। संगीत सीखने के लिए वह शिमला जा नहीं सकती थीं। ऐसे में उनकी माता ही उनकी गुरु बन गईं। किरण चौहान की माता घर में लोक गीत गुनगुुनाती थीं। माता से ही उन्होंने गाना सीखा। मां पारंपरिक गीतों को गाने और उनके बोल बताती थीं। 

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