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विजय दिवस: चार परमवीर चक्र पाने वाले हिमाचल को नहीं मिल सकी अपनी रेजिमेंट
प्रवीण कुमार/अमर उजाला, हमीरपुर
Updated Wed, 26 Jul 2017 04:07 PM IST
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इसे हिमाचल का दुर्भाग्य मानें या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमजोरी। सेना के पहले परमवीर चक्र विजेता राज्य को आजादी के 70 वर्षों बाद भी सेना की रेजिमेंट नहीं मिल पाई है। आज कारगिल विजय दिवस है। यह दिवस उस याद में मनाया जाता है, जिस ऑपरेशन में सूबे के 52 रणबांकुरे वीरगति को प्राप्त हुए।
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ऐसे मौके पर हिमाचल के नाम से सैन्य रेजिमेंट की कमी और भी खलती है। कांगड़ा जिला के मेजर सोमनाथ शर्मा ने पहला परमवीर चक्र मेडल हासिल कर हिमाचल के साहस की पहचान को शिखर पर पहुंचाया था।
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मेजर सोमनाथ ही नहीं, पालमपुर के कैप्टन विक्रम बत्रा, धर्मशाला के लेफ्टिनेंट कर्नल डीएस थापा और बिलासपुर के राइफलमैन संजय कुमार समेत प्रदेश के चार वीरों ने परमवीर चक्र हासिल कर अदम्य साहस की परंपरा को आगे बढ़ाया।
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सूबे से थलसेना, वायुसेना और नौसेना तीनों अंगों में सवा लाख से अधिक जवान सेवाएं दे रहे हैं और इतने ही सैनिक देश की सेवा करने के बाद सेवानिवृत्त होकर घर आ चुके हैं। देशभर के विभिन्न राज्यों के नाम पर सेना में रेजिमेंट हैं लेकिन हिमाचल आज भी रेजिमेंट की बाट जोह रहा है।
पड़ोसी राज्य उत्तराखंड को ही लें तो कुमाऊं और गढ़वाल नाम से दो आर्मी रेजिमेंट हैं। हरियाणा में जाट और राजपूताना नाम से सेना की दो रेजिमेंट्स हैं। लेकिन सबसे अधिक बहादुरी पुरस्कार जीतने वाले सैनिकों के राज्य में एक भी नहीं।
आर्मी रेजिमेंट न मिलने से हिमाचल की अनदेखी हो रही है। सूबे के युवकों को डोगरा रेजिमेंट में भर्ती होने के लिए मीलों दूर फैजाबाद भर्ती केंद्र जाना पड़ता है। सेवानिवृत्त आर्मी जवानों को भी रिकॉर्ड के लिए फैजाबाद के चक्कर काटने पड़ते हैं।
पूर्व सैनिक कारपोरेशन ने इस मामले को कई बार रक्षा मंत्रालय के समक्ष उठाया है, लेकिन अभी तक कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं हो पाई है। सैनिक निगम ने अब हमीरपुर से सांसद अनुराग ठाकुर से भी इस मामले की केंद्र सरकार में पैरवी करने की मांग की है।
साथ में भर्ती कोटा बढ़ाने और सीएसडी डिपो की मांग भी की है। जनसंख्या के आधार पर सर्वाधिक बहादुरी पुरस्कार हिमाचल को मिले हैं। भारतीय सेना से मिलने वाला हर दसवां मेडल हिमाचल के शूरवीर के कंधे पर सजता है।
डोगरा रेजिमेंट में हिमाचल का 75 फीसदी हिस्सा
वर्तमान में हिमाचली गबरूओं के लिए डोगरा रेजिमेंट में ही सबसे अधिक भर्ती प्रतिशत है। देश में डोगरा रेजिमेंट की स्थापना 1945-46 में हुई। रेजिमेंट में सूबे के 75 फीसदी सैनिक हैं।
इसके अलावा 25 फीसदी जम्मू और कश्मीर, गुरदासपुर और होशियारपुर के सैनिक हैं। युद्ध के समय सैनिकों में जोश पैदा करने के लिए जय ज्वाला मां का नारा लगाया जाता है, जिसे वार क्राई कहते हैं।
वर्ष 1982 से पूर्व हिमाचल से आर्मी भर्ती कोटा 2.23 फीसदी था, जिसे बाद में घटाकर .06 फीसदी कर दिया गया। देश में वर्तमान में सेना की 40 रेजिमेंट्स, 350 इनफेंटरी यूनिट्स और 22 बटालियन हैं। हर बटालियन में 8000 जवान सेवारत हैं।
इसलिए जरूरी है अपनी रेजिमेंट
हिमाचल से सेना के बड़े अधिकारियों का कहना है कि अगर प्रदेश में अपनी आर्मी रेजिमेंट होगी, तो नई भर्तियां होंगी। पूर्व सैनिकों को सेना से जुड़े रिकॉर्ड के लिए दो दिन का रेल में सफर कर फैजाबाद स्थित डोगरा रेजिमेंट भर्ती सेंटर पहुंचना पड़ता है, जिससे छुटकारा मिलेगा।
इसके अलावा पूर्व सैनिक कोटे से भर्ती होने वाले आश्रितों को भी इसका लाभ मिलेगा। देश के अन्य राज्यों की तर्ज पर औद्योगिक इकाइयां न होने के चलते सेना ही युवाओं के लिए एकमात्र रोजगार का साधन है। आर्मी रेजिमेंट के खुलने से संबंधित क्षेत्र के लोगों को होटल, ढाबे, दुकानों समेत विभिन्न प्रकार के कारोबार के अवसर प्राप्त होंगे।
कारगिल युद्ध में हिमाचल के इतने जांबाजों को मेडल
कुल शहीद 52
परमवीर चक्र 2
अशोक चक्र 2
महावीर चक्र 10
कीति चक्र 18
वीर चक्र 51
शौर्य चक्र 89
अन्य मेडल 985
प्रदेश में 52 सीएसडी कैंटीनें
सूबे में आर्मी की वर्तमान में कुल 52 सीएसडी कैंटीनें हैं, जहां सेवारत सेना के जवान, सेवानिवृत्त सैनिक और उनके आश्रित रोजमर्रा का सामान खरीदते हैं। लेकिन सूबे में सीएसडी डिपो तक नहीं।
वर्तमान में सूबे की कैंटीनों में जालंधर और पठानकोट से सामान आ रहा है। टैक्स लगने से यह महंगी दरों पर सीएसडी कैंटीनों पर बिक रहा है। जब प्रदेश के भीतर सीएसडी डिपो होगा तो सामान सस्ता भी होगा और आपूर्ति भी शीघ्र होगी।
हिमाचल प्रदेश पूर्व सैनिक निगम के प्रबंध निदेशक एवं चेयरमैन कर्नल बीसी लगवाल ने कहा कि इस मामले को रक्षा मंत्रालय के समक्ष उठाया गया है। यह कोई राजनीतिक नहीं, प्रदेश के हित से जुड़ा मामला है। इसलिए अगर जरूरत पड़ी तो आर्मी रेजिमेंट को लेकर यहां के सांसद अनुराग ठाकुर से भी मदद ली जाएगी।