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हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा- माता-पिता के समझौते से नहीं छीना जा सकता है बच्चे का अधिकार

Thu, 11 Jun 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 11 Jun 2026 05:00 AM IST
सार

अदालत ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता के बीच तलाक के समय हुआ कोई भी आपसी समझौता या सहमति उनके नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) के अधिकार को जीवनभर के लिए सीमित या समाप्त नहीं कर सकती है। 

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Himachal: High Court rules a child's rights cannot be taken away by an agreement between parents
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बच्चों के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता के बीच तलाक के समय हुआ कोई भी आपसी समझौता या सहमति उनके नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) के अधिकार को जीवनभर के लिए सीमित या समाप्त नहीं कर सकती है। समय और बदलती परिस्थितियों के अनुसार बच्चे अपने पिता से बढ़ी हुई राशि की मांग कर सकते हैं। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि समझौता माता-पिता के बीच हुआ था, इसलिए इसमें नाबालिग बच्ची की स्वतंत्र सहमति नहीं थी। माता-पिता का आपसी समझौता बच्चे के कानूनी अधिकारों को नहीं छीन सकता। कोर्ट ने कहा कि साल 2020 में 1500 की राशि तय हुई थी और आज साल 2026 में 2,000 भी एक बेहद मामूली रकम है। बढ़ती उम्र और बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बेटी गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी की पूरी हकदार है।

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एक पिता होने के नाते याचिकाकर्ता अपनी बेटी को संभालने और उसका भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी से बिल्कुल भी पीछे नहीं हट सकता। अदालत ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही, न्यायसंगत और उचित ठहराते हुए तिलक राज की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपनी बेटी को दिए जाने वाले गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी का विरोध किया था। याचिकाकर्ता और उनकी पत्नी का साल 2020 में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 (बी) में आपसी सहमति से तलाक हो गया था। उस दौरान दोनों के बीच एक समझौता हुआ था, जिसमें पिता अपनी नाबालिग बेटी के पालन-पोषण के लिए हर महीने 1,500 की राशि देने पर राजी हुआ। बाद में बढ़ती महंगाई और खर्चों को देखते हुए बेटी ने अपनी मां के माध्यम से शिमला के फैमिली कोर्ट के समक्ष धारा 127 सीआरपीसी में गुजारा भत्ता बढ़ाने की अर्जी दी। फैमिली कोर्ट ने राहत देते हुए इस राशि को 1,500 से बढ़ाकर 2,000 प्रति माह कर दिया। पिता ने फैमिली कोर्ट के इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। 

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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कोच भी शिक्षक, विवि का आदेश रद्द

 प्रदेश हाईकोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया है कि केवल कक्षा में पढ़ाने वाले ही नहीं, बल्कि छात्रों को खेलों की तकनीक और नियमों की ट्रेनिंग देने वाले स्पोर्ट्स कोच भी शिक्षक की श्रेणी में आते हैं। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने चौधरी सरवण कुमार प्रदेश कृषि विवि के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक वेट लिफ्टिंग कोच को शिक्षक मानने से मना कर दिया गया था। अदालत ने विवि को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता को शिक्षक घोषित किया जाए और उन्हें एक जनवरी 2006 से यूजीसी वेतनमान के संशोधन का लाभ दिया जाए। अदालत ने उन्हें एक जनवरी 2006 से संशोधित यूजीसी पे-स्केल का लाभ नोशनल आधार पर और याचिका दायर करने के तीन साल पहले से वास्तविक आधार पर दिया जाए। यदि विवि आज से तीन महीने के भीतर इस एरियर का भुगतान करने में विफल रहता है, तो उसे बकाया राशि पर 6 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज भी देना होगा।
 

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याचिकाकर्ता पवन कुमार को 29 सितंबर 2000 को पालमपुर कृषि विवि में वेटलिफ्टिंग कोच के अस्थायी पद पर नियुक्त किए गए। उन्हें शुरुआत से ही यूजीसी वेतनमान दिया जा रहा था। विवि की वित्त समिति ने वॉलीबाल और वेटलिफ्टिंग कोच के दो पदों को टीचिंग कैटेगरी (शिक्षक श्रेणी) में ही सृजित किया था। बावजूद विवि ने उन्हें शिक्षक का दर्जा देने से मना कर दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। जिसके बाद अदालत ने यूनिवर्सिटी को फैसला लेने का आदेश दिया था। हालांकि, 4 अगस्त 2015 को विश्वविद्यालय के प्रबंधन बोर्ड ने उनके दावे को यह कहते हुए फिर से खारिज कर दिया कि कोच का पद विश्वविद्यालय के नियमों में शिक्षक की परिभाषा में फिट नहीं बैठता। इस रिजेक्शन लेटर को याचिकाकर्ता ने दोबारा कोर्ट में चुनौती दी। विवि की ओर से दलील दी गई कि केवल यूजीसी स्केल मिलने से कोई कर्मचारी शिक्षक नहीं बन जाता। दूसरी ओर याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च अदालत के एक फैसले का हवाला दिया इसमें बताया गया है कि एक फिजिकल डायरेक्टर या कोच के कर्तव्य केवल खेल का सामान देखना नहीं, बल्कि छात्रों को खेल के नियम, तकनीक और कौशल सिखाना भी है, जो कि शिक्षण का ही एक हिस्सा है।

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