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हिमाचल: जनहित याचिका का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर लगाया दो लाख रुपये जुर्माना

Sun, 20 Sep 2026 10:04 AM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Sun, 20 Sep 2026 10:04 AM IST
सार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जनहित याचिका के दुरुपयोग पर कड़ी टिप्पणी करते हुए एक याचिका खारिज कर दी और याचिकाकर्ता पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने कहा कि जनहित याचिका समाज के ऐसे कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा के लिए है, जो खुद अदालत का दरवाजा नहीं खटखा सकते। 

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himachal high court pil misuse two lakh fine contractor welfare association
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जनहित याचिका के दुरुपयोग पर गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिका समाज के उस कमजोर वर्ग के कल्याण के लिए है, जो खुद अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकता। हाईकोर्ट ने निजी दुश्मनी को लेकर दायर की गई जनहित याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 2,00,000 का जुर्माना लगाया है।

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खंडपीठ ने कहा कि पीआईएल का इस्तेमाल ठेकेदारों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता या निजी हिसाब-किताब चुकता करने के लिए नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने कॉन्ट्रैक्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला दिया।
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कॉन्ट्रैक्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने अपने अध्यक्ष के माध्यम से कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। इसमें एक अन्य ठेकेदार के खिलाफ जालसाजी और सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर करने के आरोपों के तहत सतर्कता जांच और उन्हें ब्लैकलिस्ट करने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान प्रतिवादी ने याचिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि एसोसिएशन के अध्यक्ष ने प्रतिवादी के बेटे को 20 लाख का चेक जारी किया था, जो बाउंस हो गया था और उसके खिलाफ पहले से ही धारा 138 के तहत आपराधिक मामला चल रहा है। इसके अलावा जिन सरकारी टेंडरों को लेकर विवाद खड़ा किया गया था, उनमें याचिकाकर्ता के करीबी रिश्तेदार खुद भी शामिल थे। प्रतिवादी भी उसी टेंडर की दौड़ में था। कोर्ट ने पाया कि यह सीधे तौर पर व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता का मामला है, जिसे जनहित का मुखौटा पहनाकर पेश किया गया।

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अवमानना मामला... कोर्ट में पेश हुए बागवानी सचिव
राज्य बागवानी विभाग के सचिव सी पालरासु कोर्ट के आदेश की अवमानना मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में पेश हुए। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने पिछली सुनवाई के दौरान अधिकारी को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने बागवानी विभाग में कई वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों को दूसरे विभाग में समायोजित और रुके हुए वेतन को जारी करने का आदेश दिया था।

विभाग ने कर्मचारियों को दूसरे विभाग में समायोजित नहीं किया। सिंगल बेंच के आदेशों के बावजूद कर्मचारियों को समायोजित न किए जाने को अवमानना मानते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 7 अगस्त को बागवानी सचिव का वेतन रोकने का आदेश दिया था। 11 सितंबर को सुनवाई के दौरान एजी कार्यालय की ओर से पेश पत्र से खुलासा हुआ कि अदालत के स्थगन आदेश के बावजूद अधिकारी का वेतन उनके बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिया गया था, जिसे बाद में वापस जमा कराकर रोका गया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि आदेश के एक महीने बाद वेतन रोकना और प्रक्रियाओं में लापरवाही बरतना दर्शाता है कि सरकार व अधिकारी अदालत के आदेशों का सम्मान नहीं कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय से स्टे मिलने के कारण हाईकोर्ट ने नितिन ठाकुर  और इससे जुड़े अन्य मामलों में अनुपालन या अवमानना याचिकाओं की सुनवाई की आगे की कार्यवाही को फिलहाल 6 नवंबर तक स्थगित कर दी है। 
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