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हिमाचल: पति-पत्नी होने मात्र से पसंद के स्टेशन पर बने रहने का कानूनी अधिकार नहीं, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

Sun, 01 Mar 2026 09:39 AM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Sun, 01 Mar 2026 09:39 AM IST
सार

सरकारी सेवा में पति-पत्नी होने मात्र से किसी कर्मचारी को अपनी पसंद के स्टेशन पर बने रहने का कोई निहित कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है। ये कहना है हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का। जानें पूरा मामला...

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Himachal High Court Merely being husband and wife does not give legal right to stay at the station of choice
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने तबादला नीति में स्पष्ट किया है कि सरकारी सेवा में पति-पत्नी होने मात्र से किसी कर्मचारी को अपनी पसंद के स्टेशन पर बने रहने का कोई निहित कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने कहा कि तबादला नीति के तहत सरकार का प्रयास दंपतियों को आसपास तैनात करने का होता है। प्रशासनिक और जनहित आवश्यकताएं कर्मचारियों के व्यक्तिगत हितों से ऊपर हैं।

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सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अगस्त 2025 में खारिज हुए अपने आवेदन को फरवरी 2026 में चुनौती दी। कोर्ट ने इसे बाद में सोचा गया विचार करार दिया है। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि याचिकाकर्ता की पत्नी हेपेटाइटिस-बी से पीड़ित है और उन्हें इलाज के लिए पीजीआई चंडीगढ़ जाना पड़ता है। इस पर कोर्ट ने कहा कि चूंकि सोलन जिला चंडीगढ़ से करीब है। इसलिए यदि याचिकाकर्ता की पत्नी अपनी तैनाती वहां करवाने के लिए आवेदन करती है, तो विभाग आवेदन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर सकता है। इसके साथ ही अदालत ने स्थानांतरण आदेशों में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया और याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह छूट दी कि यदि याचिकाकर्ता या उनकी पत्नी साथ रहने या बीमारी के आधार पर कोई नया आवेदन करते हैं तो विभाग उस पर विचार कर सकता है। 

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गौरतलब है कि याचिकाकर्ता राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला कशमैला, जिला मंडी में तैनात थे। विभाग ने उनका तबादला दयोठी, जिला सोलन कर दिया था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि उनका मामला एक दंपती का मामला है, इसलिए उन्हें मौजूदा स्थान से नहीं हटाया जाना चाहिए था। उनका तबादला राजनैतिक सिफारिश डीओ नोट के आधार पर किया गया है, जो कानूनन गलत है। अदालत ने यह आदेश अशोक कुमार मामले में पारित किया है।
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हुम खड्ड में खनन मामले में दायर याचिका खारिज ड्रेजिंग जारी रखने के निर्देश
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जिला ऊना के हरोली उपमंडल में हुम खड्ड क्षेत्र में अवैध खनन और पर्यावरण क्षति के आरोपों को लेकर दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। साथ ही मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने पूर्व में लगाए गए स्टे को हटाते हुए सरकार को वैज्ञानिक तरीके से ड्रेजिंग (गाद निकलना) जारी रखने के निर्देश दिए हैं।

अदालत ने पाया कि 11 अगस्त 2024 को आई बाढ़ के बाद खड्ड में भारी मात्रा में मलबा जमा हो गया था। विशेषज्ञों की राय के अनुसार भविष्य में बाढ़ के खतरे को कम करने के लिए इस मलबे की ड्रेजिंग अनिवार्य है। अदालत ने सरकार को ड्रेजिंग कार्य के लिए विशेषज्ञ की ओर से दिए गए सुझावों पर भी विचार करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि खोदाई और ड्रेजिंग के दौरान इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन की भूमिगत पाइपलाइनों से सुरक्षित दूरी बनाए रखी जाए। पाइपलाइन के पास किसी भी प्रकार की खनन गतिविधि की अनुमति नहीं होगी। 

सुनिश्चित करना होगा कि ड्रेजिंग से जल संचयन और भूजल स्तर में सुधार हो। ड्रेजिंग का कार्य 12 महीने के भीतर पूरा करना होगा।  हालांकि, अदालत ने राज्य को निर्देश दिया है कि वह भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन को रोकने के लिए सतर्क रहे।

धारा 118 में निर्माण में देरी  पर जमीन सरकार के नाम करना न्यायसंगत नहीं : कोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि धारा 118 के तहत निर्माण में देरी पर जमीन सरकारी घोषित करना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने राज्य सरकार की ओर से दायर उस अपील याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें सोलन के कंडाघाट में 150 बीघा जमीन को सरकार को वापस लौटाने की मांग की गई थी। उच्च न्यायालय ने निचली राजस्व अदालतों के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि चूंकि कंपनी ने जमीन का दुरुपयोग नहीं किया और न ही इसे किसी और को बेचा, बल्कि परिस्थितियों के कारण देरी हुई। इसलिए जमीन को सरकार के नाम करना न्यायसंगत नहीं है।

प्रतिवादी (नोबल हाउस क्रिएशन) ने साल 2008 में कंडाघाट के राहेड़ गांव में एक रिसॉर्ट बनाने के लिए हिमाचल प्रदेश टैनेंसी एंड लैंड रिफॉर्म्स एक्ट, 1972 की धारा 118 के तहत अनुमति लेकर 150 बीघा जमीन खरीदी थी। कानून के मुताबिक, जमीन खरीदने के 2 साल के भीतर निर्माण कार्य शुरू करना अनिवार्य था। वर्ष 2017 में जिला कलेक्टर सोलन ने आदेश दिया कि कंपनी 7 साल बाद भी रिसॉर्ट बनाने में विफल रही है, इसलिए जमीन सरकार के नाम निहित कर दी जाए। कंपनी ने आदेश को मंडलायुक्त के पास चुनौती दी। कंपनी ने तर्क दिया कि उस समय वैश्विक मंदी के कारण बैंकों ने ऋण से मना कर दिया था। 
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