हिमाचल: पति-पत्नी होने मात्र से पसंद के स्टेशन पर बने रहने का कानूनी अधिकार नहीं, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
सरकारी सेवा में पति-पत्नी होने मात्र से किसी कर्मचारी को अपनी पसंद के स्टेशन पर बने रहने का कोई निहित कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है। ये कहना है हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का। जानें पूरा मामला...
विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने तबादला नीति में स्पष्ट किया है कि सरकारी सेवा में पति-पत्नी होने मात्र से किसी कर्मचारी को अपनी पसंद के स्टेशन पर बने रहने का कोई निहित कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने कहा कि तबादला नीति के तहत सरकार का प्रयास दंपतियों को आसपास तैनात करने का होता है। प्रशासनिक और जनहित आवश्यकताएं कर्मचारियों के व्यक्तिगत हितों से ऊपर हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अगस्त 2025 में खारिज हुए अपने आवेदन को फरवरी 2026 में चुनौती दी। कोर्ट ने इसे बाद में सोचा गया विचार करार दिया है। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि याचिकाकर्ता की पत्नी हेपेटाइटिस-बी से पीड़ित है और उन्हें इलाज के लिए पीजीआई चंडीगढ़ जाना पड़ता है। इस पर कोर्ट ने कहा कि चूंकि सोलन जिला चंडीगढ़ से करीब है। इसलिए यदि याचिकाकर्ता की पत्नी अपनी तैनाती वहां करवाने के लिए आवेदन करती है, तो विभाग आवेदन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर सकता है। इसके साथ ही अदालत ने स्थानांतरण आदेशों में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया और याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह छूट दी कि यदि याचिकाकर्ता या उनकी पत्नी साथ रहने या बीमारी के आधार पर कोई नया आवेदन करते हैं तो विभाग उस पर विचार कर सकता है।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जिला ऊना के हरोली उपमंडल में हुम खड्ड क्षेत्र में अवैध खनन और पर्यावरण क्षति के आरोपों को लेकर दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। साथ ही मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने पूर्व में लगाए गए स्टे को हटाते हुए सरकार को वैज्ञानिक तरीके से ड्रेजिंग (गाद निकलना) जारी रखने के निर्देश दिए हैं।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि धारा 118 के तहत निर्माण में देरी पर जमीन सरकारी घोषित करना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने राज्य सरकार की ओर से दायर उस अपील याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें सोलन के कंडाघाट में 150 बीघा जमीन को सरकार को वापस लौटाने की मांग की गई थी। उच्च न्यायालय ने निचली राजस्व अदालतों के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि चूंकि कंपनी ने जमीन का दुरुपयोग नहीं किया और न ही इसे किसी और को बेचा, बल्कि परिस्थितियों के कारण देरी हुई। इसलिए जमीन को सरकार के नाम करना न्यायसंगत नहीं है।