सात महीने के बाद भी लोकायुक्त नियुक्ति नहीं कर सकी सरकार
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भ्रष्टाचार पर शून्य सहनशीलता का दंभ भरने वाली जयराम सरकार अपने ही वायदों को भूलने लगी है। भ्रष्टाचार की जांच व नियंत्रण के लिए स्थापित लोकायुक्त का पद हिमाचल में डेढ़ साल से खाली है। विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा ने अपने दृष्टिपत्र में वायदा किया था कि सरकार का गठन होते ही नए लोकायुक्त की नियुक्ति की जाएगी।
सरकार के गठन के सात महीने बाद मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर गृह विभाग ने तकरीबन सभी बिंदुओं पर चर्चा की गई, लेकिन लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकी है। पूर्व वीरभद्र सरकार ने 3 फरवरी, 2012 को जस्टिस लोकेश्वर सिंह पांटा को प्रदेश का लोकायुक्त नियुक्त किया था।
पांच साल का कार्यकाल 2017 फरवरी में खत्म होने से पहले तत्कालीन सरकार ने लोकायुक्त की नियुक्ति को उम्र की अर्हता को बढ़ाने के लिए एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव कर दिया। सूत्रों की मानें तो सरकार पांटा को लोकायुक्त बनाए रखने के पक्ष में थी। हालांकि, लोकायुक्त एक्ट में संशोधन के लिए केंद्र से अनुमति लेनी पड़ती, जो मिलनी मुश्किल थी।
दृष्टिपत्र को बनाया गया था सरकारी दस्तावेज
ऐसे में न तो एक्ट में संशोधन हुआ और न नए लोकायुक्त की नियुक्ति हो सकी। इस बीच चुनाव आ गए और भाजपा ने दृष्टिपत्र जारी कर दावा किया कि सरकार गठित होते ही नए लोकायुक्त की नियुक्ति की जाएगी।
सूत्रों की मानें तो सरकार और गृह विभाग ने नई सरकार के गठन के बाद लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया है। जाहिर है सरकार के लोकायुक्त पद के रिक्त रखने के बाद भ्रष्टाचार को लेकर सख्ती और गंभीरता के दावे पर सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं।
जयराम मंत्रिमंडल ने शुरुआती दौर की एक बैठक में निर्णय लिया था कि भाजपा का स्वर्णिम हिमाचल दृष्टिपत्र 2017 आधिकारिक दस्तावेज होगा। निर्देश दिए गए थे कि नीतियों के निर्माण के दौरान दृष्टिपत्र में किए गए वायदों व बातों का ध्यान रखा जाए।
इसके बाद कई बिंदुओं को मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के पहले बजट में जगह भी मिल गई, लेकिन लोकायुक्त की नियुक्ति पर कोई फैसला नहीं हो सका।