जिंदा रहते अनदेखी, निधन के बाद भी नजरअंदाज कर दिए गए लोक गायक प्रताप
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सरकार और प्रशासन ने कांगड़ा लोक गायन के सबसे पुराने और प्रख्यात लोक गायक प्रताप चंद शर्मा की जीवित रहते तो अनदेखी की ही, अंतिम विदाई में भी उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। लोक गायक का अंतिम संस्कार स्थानीय रीति रिवाजों के साथ ब्यास नदी के किनारे कालेश्वर में बुधवार को हुआ। उनकी अंतिम यात्रा में परागपुर क्षेत्र के सैकड़ों लोगों ने भाग लेकर उन्हें अंतिम विदाई दी।
हैरत की बात है कि प्रताप चंद शर्मा के दर्जनों प्रख्यात गीत चुराकर स्टार लोक गायक बने कलाकारों में से कोई भी उनकी अंत्येष्टि के लिए चंद लम्हा नहीं निकाल सका। प्रताप चंद शर्मा जैसे बड़े लोक कलाकार के जिले से होने का दंभ भरने वाले किसी भी नेता ने दिवंगत को अंतिम विदाई के लिए वक्त नहीं निकाला। प्रशासन के किसी भी अधिकारी ने प्रताप चंद शर्मा की अंत्येष्टि में जाकर बुजुर्ग कलाकार को आखिरी बार भी सम्मान देना उचित नहीं समझा।
कांगड़ा की लोक गायकी के जनक रहे स्व. प्रताप चंद शर्मा की अंतिम रवानगी इस तरह से होगी, किसी ने सोचा भी नहीं था। सरकार ने उनके जीवित रहते भी अनदेखी की। उन्हें पेंशन तक नहीं दी गई। जब वह दुनिया से विदा हुए तब भी इस महान कलाकार को याद नहीं किया गया। राज्यपाल और मुख्यमंत्री की तरफ से निधन पर शोक संदेश से औपचारिकता निभा दी गई। जबकि, कांगड़ी लोक गायकी को दिशा देने वाले पं. प्रताप चंद शर्मा के लिखे और गाए गाने आज भी हिमाचल की आबोहवा में रचे बसे हैं।
कई लोकगायक उन गानों को गाकर स्टार बन गए। प्रताप चंद ने अपनी लेखनी और गायकी को कभी व्यावसायिक रूप नहीं दिया था। प्रताप चंद के पौत्र मोहित शर्मा ने कहा कि अच्छा होता यदि सरकार और प्रशासन या जनसंपर्क विभाग का कोई एक अधिकारी ही दादा जी को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचता। उनके एक साथी कवि सुखदेव शास्त्री जिन्होंने उनके दादा जी के साथ काम किया था, वह ही उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए।
पौत्र मोहित शर्मा ने संभाली लोकगायन की विरासत
एसडीएम देहरा धनवीर ठाकुर का कहना है कि प्रशासन को इसकी सूचना समय पर नहीं मिल पाई। उनके निधन का दुख है। महान कलाकार प्रताप चंद के गानों में कला और प्रदेश की संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती थी।
लोकगायक प्रताप चंद शर्मा उर्फ प्रतापु की गायकी की विरासत को अब उनके पौत्र मोहित शर्मा संभाले हुए हैं। जनवरी 2018 में मोहित शर्मा ने दो कांगड़ी गीत ठंडी-ठंडी हवा जे झुल्दी, झुल्दे चीला दे डालू, जीना कांगड़े दा और मेरे कन्ने बोल लछिये गाने गाकर यू-ट्यूब पर अपलोड किए थे।
400 गीत लिखे, रिकॉर्ड पर 112 ही आ पाए, कॉपीराइट के लिए नहीं थे पैसे
पौत्र मोहित शर्मा ने बताया कि दादा ने करीब 400 गीत लिखे और गाए। लेकिन, रिकॉर्ड पर 112 गाने ही आ पाए जो पटियाला की संस्था ने शीर्षक ‘मेरी धरती मेरे गीत’ शीर्षक से प्रकाशित किए थे। उनके लिखे गानों को उनका परिवार कॉपीराइट नहीं करवा पाया। इस कारण उनके लिखे और गाए गाने गाकर कई गायक बुलंदियों पर पहुंच गए और दादा अंतिम समय तक गुमनामी के अंधेरे में रहने को मजबूर हुए।