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Himachal Pradesh: रद्दी बनती गईं विशेषज्ञों की रिपोर्ट... खतरा अभी और बड़ा, अति संवेदनशील श्रेणी में ये भाग

Tue, 29 Aug 2023 10:25 AM IST
Krishan Singh विश्वास भारद्वाज, शिमला
विश्वास भारद्वाज, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Tue, 29 Aug 2023 10:25 AM IST
सार

 हिमाचल आपदा की दृष्टि से कितना संवेदनशील है, इसे लेकर कई अध्ययन हुए, कई रिपोर्टें तैयार होती रहीं, लेकिन इन्हें रद्दी बनाया जाता रहा।

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himachal disaster: Experts' reports became junk... the danger is still bigger
आपदा के लिहाज से संवेदनशील जिले। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भौगोलिक व भूगर्भीय कारणों से हिमाचल आपदा की दृष्टि से कितना संवेदनशील है, इसे लेकर कई अध्ययन हुए, कई रिपोर्टें तैयार होती रहीं, लेकिन इन्हें रद्दी बनाया जाता रहा। विभिन्न एजेंसियों के विशेषज्ञों ने सरकारों को रिपोर्टें सौंप हरित पट्टी में निर्माण पर प्रतिबंध का सुझाव दिया। पर आपदा के लिहाज से असुरक्षित करार दिए गए क्षेत्रों में धड़ल्ले से निर्माण जारी रहा। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार चंबा, कुल्लू और किन्नौर जिलों के अलावा कांगड़ा व शिमला का कुछ हिस्सा अतिसंवेदनशील है। प्राधिकरण ने इस रिपोर्ट में बुनियादी ढांचा विकसित करने की सलाह दी है लेकिन इस पर गौर नहीं हुआ। 

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सीस्मिक जोन चार और पांच में आता है हिमाचल
भूकंप के लिहाज से भी हिमाचल सीस्मिक जोन चार और पांच में आता है। जोन चार संवेदनशील और जोन पांच अतिसंवेदनशील होती है। चार अप्रैल 1905 को सबसे बड़ा भूकंप सीस्मिक जोन-5 में आने वाले कांगड़ा में आया था। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 7.8 थी। इसमें करीब 20 हजार लोगों की मौत हुई थी और बड़े-बड़े भवन ध्वस्त हो गए थे। 
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ग्रीन एरिया में निर्माण से चेताया
शहर एवं नगर नियोजन विभाग का काम देख चुके आईएएस अधिकारी अभय शुक्ला ने एक रिपोर्ट बनाई थी, जिसमें शिमला में एक दर्जन से ज्यादा ग्रीन एरिया चिह्नित किए थे कि यहां निर्माण न हों। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कृष्णानगर में अतिरिक्त निर्माण कार्य न करने को लेकर भूविज्ञानियों ने 2012 में अपनी रिपोर्ट दी थी। बावजूद इसके राजीव आवास योजना के तहत कृष्णानगर में आवासों का निर्माण पूरा होने के बाद भी कई अन्य भवन बनते रहे।

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पहले भी झेल चुके त्रासदी  

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उफनती ब्यास नदी। - फोटो : संवाद

1991-सतलुज घाटी में सोल्डन खड्ड में बादल फटने और बाढ़ से 32 की मौत। 15 घर तबाह।
1995- कुल्लू में भूस्खलन में 65 लोग दबे।
2007-शिमला के गानवी गांव में 58 की मौत।
1997- पब्बर घाटी में बाढ़ से 124 की मौत।
2003-कुल्लू में 30 लोगों ने गंवाई जान। 
2000-सतलुज नदी में बाढ़ से 135 मरे।
2001- बैजनाथ के छोटा भंगाल में बाढ़ सेे 12 मरे।

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