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हिमाचल के कर्मचारियों के लिए राहत: सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी एक्ट पर सरकार की रिव्यू पिटीशन की खारिज, जानें

Fri, 30 Oct 2026 12:18 PM IST
Ankesh Dogra न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला Published by: Ankesh Dogra Updated Fri, 30 Oct 2026 12:18 PM IST
सार

हिमाचल प्रदेश में अनुबंध कर्मचारियों के सेवा लाभ को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में राज्य सरकार को झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी एक्ट 2024 से जुड़े मामले में सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है। इससे करीब डेढ़ लाख कर्मचारियों के वित्तीय लाभ और वरिष्ठता से जुड़ी मांगों को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं।

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himachal contract employees supreme court review petition dismissed
कर्मचारी एक्ट पर सरकार की याचिका खारिज - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिल पाई है। अनुबंध कर्मचारियों को सेवा अवधि के लाभ देने से संबंधित हिमाचल प्रदेश रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एक्ट, 2024 को लेकर सरकार की ओर से दाखिल रिव्यू पिटीशन खारिज हो गई है। इस घटनाक्रम से प्रदेश के करीब 1.50 लाख कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।

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यह विवाद उन कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्होंने नियमित नियुक्ति से पहले कई वर्षों तक अनुबंध आधार पर सरकारी विभागों में सेवाएं दी हैं। कर्मचारियों की मांग रही है कि अनुबंध पर की गई सेवा को भी उनकी नियुक्ति की मूल तारीख से सेवा लाभ और वरिष्ठता की गणना में शामिल किया जाए।
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सरकार के खिलाफ इस कानूनी लड़ाई में कर्मचारियों को पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट से राहत मिली थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अब पुनर्विचार याचिका भी खारिज होने से सरकार के सामने अदालत के पहले के फैसलों के अनुरूप कार्रवाई करने का सवाल खड़ा हो गया है।
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2003 से शुरू हुई थी अनुबंध भर्ती की व्यवस्था
हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2003 से सरकारी विभागों में अनुबंध आधार पर भर्तियां की जाती रही हैं। शुरुआती दौर में कर्मचारियों को नियमित होने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था। कई कर्मचारियों को आठ वर्ष तक अनुबंध पर सेवाएं देनी पड़ीं।

समय के साथ अलग-अलग सरकारों ने नियमितीकरण के लिए निर्धारित अवधि में बदलाव किया। आठ साल की अवधि को पहले सात, फिर पांच, तीन और बाद में दो साल किया गया।

इसी दौरान अनुबंध कर्मचारियों ने नियुक्ति की पहली तारीख से वित्तीय लाभ और वरिष्ठता देने की मांग उठाई। कई कर्मचारी इस मांग को लेकर अदालत पहुंचे और अलग-अलग मामलों में न्यायिक राहत प्राप्त की।

2024 के कानून को अदालत में दी गई चुनौती
अनुबंध कर्मचारियों के वित्तीय लाभ को लेकर चल रहे विवाद के बीच राज्य सरकार ने वर्ष 2024 में हिमाचल प्रदेश रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एक्ट पारित किया।

इस कानून के जरिए अनुबंध और नियमित कर्मचारियों की सेवा शर्तों को अलग-अलग रखने का प्रावधान किया गया था। इसके तहत अनुबंध अवधि को नियमित कर्मचारियों की सेवा शर्तों के समान लाभ देने के दायरे से बाहर रखने की व्यवस्था की गई।

कर्मचारियों ने इस कानून को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। उनका पक्ष था कि इस व्यवस्था से अनुबंध अवधि के दौरान किए गए कार्य और उससे जुड़े सेवा लाभ प्रभावित हो रहे हैं।

हाईकोर्ट ने 25 अप्रैल 2026 को सुनाया था अहम फैसला
इस मामले में 25 अप्रैल 2026 को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। देवेंद्र कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार मामले से जुड़ी कुल 445 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने संबंधित कानून को असंवैधानिक करार देकर निरस्त कर दिया।

अदालत ने कर्मचारियों के सेवा लाभ और वरिष्ठता से जुड़े दावों पर राहत देते हुए सरकार को निर्धारित समय में आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली सरकार को राहत
सरकार की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को सुप्रीम कोर्ट ने 29 जुलाई 2026 को खारिज कर दिया था। इसके साथ ही कर्मचारियों को देय वित्तीय लाभों के भुगतान के लिए चार महीने की समयसीमा दिए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद सरकार ने फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए रिव्यू पिटीशन दाखिल की। अब इस याचिका के भी खारिज होने से कर्मचारियों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। हिमाचल हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुरेंद्र वर्मा के अनुसार, पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद सरकार के लिए इस मामले में राहत प्राप्त करने के विकल्प सीमित हो गए हैं। अब अदालतों के निर्देशों की अनुपालना महत्वपूर्ण होगी।

सरकार पर पड़ सकता है हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ
इस फैसले का असर प्रदेश सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर भी पड़ सकता है। उपलब्ध अनुमानों के अनुसार, अनुबंध अवधि के वित्तीय लाभों का भुगतान करने पर सरकार को करीब 8,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। यह देनदारी करीब डेढ़ लाख कर्मचारियों से जुड़े मामलों के आधार पर बताई जा रही है। इसके अलावा कर्मचारियों और पेंशनरों के वेतनमान के एरियर तथा अन्य लंबित वित्तीय लाभों का भुगतान भी सरकार के सामने चुनौती बना हुआ है। इन लंबित भुगतानों की अनुमानित राशि भी करीब 8,000 करोड़ रुपये बताई गई है। यदि दोनों देनदारियों को जोड़कर देखा जाए तो सरकार पर लगभग 16,000 करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ पड़ सकता है।

अब कर्मचारियों को किस बात का है इंतजार?
सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद कर्मचारियों की निगाहें अब सरकार की अगली कार्रवाई पर हैं। वे चाहते हैं कि अनुबंध अवधि में दी गई सेवाओं को पात्रता के अनुसार लाभों की गणना में शामिल किया जाए। इसका असर केवल वेतन और एरियर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वरिष्ठता और अन्य सेवा संबंधी लाभों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल इस मामले में सबसे अहम बात यह होगी कि राज्य सरकार अदालत के आदेशों को किस तरह लागू करती है और पात्र कर्मचारियों को उनका बकाया लाभ कब तक मिलता है।
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