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विस चुनाव: वीरभद्र सिंह को नहीं साधने से निकल रहे हैं कई सियासी मायने

Sun, 10 Sep 2017 01:27 PM IST
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, शिमला
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, शिमला Updated Sun, 10 Sep 2017 01:27 PM IST
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himachal assembly election virbhadra singh and sukhwinder singh sukhu

कांग्रेस में वीरभद्र और सुक्खू खेमे के बीच वर्चस्व की जंग जल्द निर्णायक दौर में पहुंचने वाली है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की हाईकमान से मुलाकात बेनतीजा साबित हुई। प्रदेश अध्यक्ष सुक्खू नहीं हटेंगे, यह प्रदेश प्रभारी शिंदे स्पष्ट कर चुके हैं। पहले भी कई बार वीरभद्र के सामने झुक चुकी हाईकमान की रीढ़ इस बार सख्त दिख रही है।

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मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का कभी फ्रंटफुट तो कभी बैकफुट पर जाना संकेत दे रहा है कि असल लड़ाई टिकटों की है, जिसकी प्रक्रिया अगले कुछ दिन में शुरू होनी है। उधर, पीसीसी सुखविंद्र सिंह सुक्खू के पीछे एक मजबूत बैकअप माना जा रहा है। इसके चलते पार्टी ने उन्हें सीएम के बराबर खड़ा कर दिया है।
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प्रदेश में कांग्रेस के इतिहास में पहली बार प्रदेश अध्यक्ष का पद मुख्यमंत्री को टक्कर देता दिख रहा है। पांच बार प्रदेश कांग्रेस को लीड कर चुके वीरभद्र इस बार कमान हासिल करने को राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी तक से मिल चुके हैं। अड़ने के बाद भी उनकी मांगों पर अभी तक कोई बड़ा निर्णय दिल्ली से नहीं आया है।

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ये दो नेता भी कर चुके दिल्ली दौरा

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उधर, बीते एक सप्ताह के घटनाक्रम को अगर पार्टी के अंदरुनी समीकरणों को जोड़ कर देखें तो तस्वीर साफ होती दिख रही है। कैबिनेट मंत्री कौल सिंह का दिल्ली में शिंदे से मिलने से लेकर दिग्गज रहे पंडित सुखराम का दिल्ली दौरा भी वीरभद्र सिंह के सुक्खू के खिलाफ हल्ला बोलने से जुड़ता दिख रहा है।

दोनों नेता वीरभद्र के विरोधी के तौर पर जाने जाते रहे हैं। केंद्र की सियासत करने वाले हिमाचल के दिग्गज आनंद शर्मा, विप्लव ठाकुर भी वीरभद्र खेमे के नहीं माने जाते। इनका अपना अलग वजूद होने के साथ शिंदे से पुराना संबंध हैं। शिंदे दूसरे दौरे में हिमाचल के कांगड़ा पहुंचे तो विप्लव ठाकुर के साथ सुक्खू थे।

दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री कांगड़ा के बगल की सीट शाहपुर में सुक्खू को कोसते सुने गए। अब तक शिंदे से उनकी मुलाकात नहीं हुई। हाईकमान ने वीरभद्र की पीसीसी चीफ की बदलने की मांग भले नहीं स्वीकारी, लेकिन राहत यह है कि उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने की पुष्टि शिंदे ने जरूर की है। अब दोनों खेमों की नजर चुनाव से पहले के अगले पड़ाव टिकट आवंटन पर टिकी है।

सियासत के पुराने माहिर हैं वीरभद्र

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वीरभद्र के तीखे तेवरों के बावजूद सुक्खू कुर्सी पर बने हुए हैं। प्रदेश में उनका कद पार्टी से बड़ा माना जाता रहा है। सियासत के इस पुराने माहिर के सामने इससे पहले ठाकुर कौल सिंह और विप्लव ठाकुर की पीसीसी की कुर्सी नहीं टिक पाई थी।

इस बार खींचतान लंबी खींच रही है, जिसका नुकसान पार्टी को हो सकता है। अब अगला टकराव टिकट आवंटन के दौरान दिखेगा। वीरभद्र अपने पुत्र विक्रमादित्य सहित अपने करीबियों को हर हाल में टिकट दिलवाना चाहेंगे, जबकि सुक्खू कैंप विरोधियों की राहें मुश्किल बनाएगा। परिवारवाद सहित कई मुद्दे अभी से उठने भी लगे हैं।

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