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Shimla News: दिहाड़ी लगाकर बेटे को दी अच्छी शिक्षा, आज सेना में दे रहा सेवाएं
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मातृ दिवस विशेष.....
अब बेटी को अध्यापिका बनाना है लक्ष्य
पति की मौत के बाद नहीं मानी हार, मजदूरी करके की गुजर बसर
दीक्षा सरोय
शिमला। लाडलों को अच्छी शिक्षा मिले, अच्छी नौकरी मिले, इसके लिए पहाड़ की कई महिलाएं खुद दिहाड़ी लगाकर अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं। ऐसी ही मिसाल कायम की है अल्का ने। कांगड़ा जिले की अल्का ने एकल मां होकर भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई। दस मई को मनाए जाने वाले मातृ दिवस पर अल्का का यह संघर्ष उन महिलाओं के लिए यह एक शिक्षा है कि अकेले पड़ने पर भी हार न मानें।
दिहाड़ी लगाकर अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने वाली अल्का ठाकुर ने अपने बेटे को सेना में भेजने का सपना पूरा कर लिया है। अब वह अपनी बेटी को अध्यापिका बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं। अल्का की कहानी सिर्फ एक मां की कहानी नहीं है बल्कि यह उन तलाकशुदा या पति की मृत्यू के कारण एकल हुई महिलाओं की कहानी है जो समाज और परिस्थितियों के खिलाफ लड़ रही हैं। कांगड़ा के पंचरुखी की रहने वाली अल्का के पति की गंभीर बीमारी से मौत हो गई थी। वर्ष 2021 में पति की मौत के कारण वह अकेली पड़ गईं और यहां से शुरू हुआ उनका संघर्ष। अल्का के दो बच्चे हैं एक बेटा और एक बेटी उनका बेटा उस समय दसवीं में पढ़ता था और बेटी बारहवीं में पढ़ती थी। अल्का के पास बच्चों की पढ़ाई के लिए न पैसा था न जमीन। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दिहाड़ी मजदूरी शुरू कर दी। लोगों के घरों में घास काटकर वह मुश्किल से 150 से 200 रुपये कमा लेती थीं। इस दौरान उन्होंने लोगों के मकान बनाने में भी दिहाड़ी पर काम किया लेकिन हिम्मत नहीं हारी। अब बेटा सेना में भर्ती हो गया तो हालत सुधरने लगी है। बेटी ने एमकॉम की पढ़ाई की है और वह ट्यूशन भी पढ़ाती है। अल्का का कहना है कि वह अपने बेटे को काबिल बना पाईं यही उनकी कमाई है।
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अब बेटी को अध्यापिका बनाना है लक्ष्य
पति की मौत के बाद नहीं मानी हार, मजदूरी करके की गुजर बसर
दीक्षा सरोय
शिमला। लाडलों को अच्छी शिक्षा मिले, अच्छी नौकरी मिले, इसके लिए पहाड़ की कई महिलाएं खुद दिहाड़ी लगाकर अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं। ऐसी ही मिसाल कायम की है अल्का ने। कांगड़ा जिले की अल्का ने एकल मां होकर भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई। दस मई को मनाए जाने वाले मातृ दिवस पर अल्का का यह संघर्ष उन महिलाओं के लिए यह एक शिक्षा है कि अकेले पड़ने पर भी हार न मानें।
दिहाड़ी लगाकर अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने वाली अल्का ठाकुर ने अपने बेटे को सेना में भेजने का सपना पूरा कर लिया है। अब वह अपनी बेटी को अध्यापिका बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं। अल्का की कहानी सिर्फ एक मां की कहानी नहीं है बल्कि यह उन तलाकशुदा या पति की मृत्यू के कारण एकल हुई महिलाओं की कहानी है जो समाज और परिस्थितियों के खिलाफ लड़ रही हैं। कांगड़ा के पंचरुखी की रहने वाली अल्का के पति की गंभीर बीमारी से मौत हो गई थी। वर्ष 2021 में पति की मौत के कारण वह अकेली पड़ गईं और यहां से शुरू हुआ उनका संघर्ष। अल्का के दो बच्चे हैं एक बेटा और एक बेटी उनका बेटा उस समय दसवीं में पढ़ता था और बेटी बारहवीं में पढ़ती थी। अल्का के पास बच्चों की पढ़ाई के लिए न पैसा था न जमीन। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दिहाड़ी मजदूरी शुरू कर दी। लोगों के घरों में घास काटकर वह मुश्किल से 150 से 200 रुपये कमा लेती थीं। इस दौरान उन्होंने लोगों के मकान बनाने में भी दिहाड़ी पर काम किया लेकिन हिम्मत नहीं हारी। अब बेटा सेना में भर्ती हो गया तो हालत सुधरने लगी है। बेटी ने एमकॉम की पढ़ाई की है और वह ट्यूशन भी पढ़ाती है। अल्का का कहना है कि वह अपने बेटे को काबिल बना पाईं यही उनकी कमाई है।
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