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हिमाचल: बर्फीले क्षेत्रों में तैनात सैनिकों के लिए लाहौल के छरमा से बनेगी दवा
Sun, 21 Jun 2020 09:53 AM IST
Krishan Singh
रोशन ठाकुर, अमर उजाला, कुल्लू
रोशन ठाकुर, अमर उजाला, कुल्लू
Published by: Krishan Singh
Updated Sun, 21 Jun 2020 09:53 AM IST
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छरमा
- फोटो : अमर उजाला
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देश के ऊंचाई (हाई एल्टीट्यूड) वाले सीमावर्ती इलाकों में ड्यूटी देने वाले भारतीय सेना के जवानों को होने वाली समस्याओं से लाहौल का छरमा निजात दिलाएगा। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) छरमा (सीबकथॉर्न) की दवा बनाने में जुट गया है। हालांकि यह रिसर्च पिछले करीब डेढ़ दशक से चल रही है, लेकिन पहले चरण में दवा के फ्री क्लीनिक रिसर्च का काम पूरा हो गया है। छरमा की दवा से फौजियों को हाई अल्टीट्यूड में होने वाली ऑक्सीजन की कमी, कम तापमान और वातावरण को कम समय में अनुकूल बनाने में मदद करेगी।
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हालांकि छरमा से कोरोना की भी दवा बनाने का दावा किया है, जिसको लेकर सीबकथॉर्न एसोसिएशन ऑफ इंडिया आईआईटी रूड़की व मंडी सहित सात संस्थानों के साथ मिलकर बूस्टर दवा बनाने जा रही है और आयुष मंत्रालय को साढ़े सात करोड़ का प्रोजेक्ट मंजूरी के लिए भेजा है। जानकारी के अनुसार 2000 में हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर और डीआरडीओ में एमओयू साइन हुआ था। चार से पांच साल स्टडी के बाद डीआरडीओ ने चरक नाम से एक प्रोजेक्ट तैयार किया और इसे 2007-08 में मंजूरी मिली।
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प्रथम चरण में दवा को फ्री क्लीनिक रिसर्च में परीक्षण किया, जहां इसके बेहतर परिणाम आए। हाइपोक्सिया और स्नो बाइट्स पर डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ फिजियोलॉजी एंड अलाइड साइंसेज (डीआईपीएएस) काम कर रहा है। इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज (आईएनएमएएस) दिल्ली ने रेडिएशन को लेकर छरमा की क्रीम तैयार कर दी है। सीबकथॉर्न एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महासचिव डॉ. वीरेंद्र सिंह ने कहा कि फ्री क्लीनिक रिसर्च में इसका ट्रायल सफल रहा है। हाई एल्टीट्यूड में सैनिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए अब इसे सिरे चढ़ाना चाहिए।
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ऑक्सीजन की कमी से फेफड़ों को होता है नुकसान
हाई एल्टीट्यूड इलाकों में इंसान को वातावरण अनुकूल करने में दस से 12 दिन लगते हैं। जबकि भारतीय जवान 12 से 18 हजार फीट की ऊंचाई में तैनात रहते हैं। ऐसे में यहां ऑक्सीजन, स्नो बाइट्स तथा रेडिएशन की समस्या रहती है। डा वीरेंद्र सिंह ने कहा कि ऑक्सीजन की कमी से सबसे अधिक नुकसान फेफड़ों को होता है, जिससे मौत भी हो जाती है।