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फर्जी डिग्री प्रकरण: अपने ही संस्थान में एमडी और छात्र दोनों था राणा

Thu, 12 Mar 2020 10:59 AM IST
Krishan Singh राकेश शर्मा, अमर उजाला, सोलन
राकेश शर्मा, अमर उजाला, सोलन Published by: Krishan Singh Updated Thu, 12 Mar 2020 10:59 AM IST
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Fake degree case: Rajkumar Rana was both an MD and a student in his own institute
रिकॉर्ड कब्जे में लेती पुलिस टीम - फोटो : अमर उजाला

फर्जी डिग्री प्रकरण में फंसे राजकुमार राणा की असल कहानी काफी दिलचस्प है। पुलिस ने राजकुमार राणा का पूरा बही खाता निकाला है। उसके खुद की पढ़ाई और अब तक की जिंदगी के कई राज उजागर हुए हैं। पुलिस के हाथ लगे रिकॉर्ड के मुताबिक राजकुमार राणा ने दसवीं तक पढ़ाई की है। उसके बाद फार्मासिस्ट का डिप्लोमा किया। इसके बाद अरबों की संपत्ति जुटाई और देश भर के लोगों को शिक्षक बनाने में जुट गया।

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राजकुमार ने वर्ष 2010 में एचआइवी एड्स विषय पर शोध में पीएचडी की डिग्री मेघालय के एक निजी विश्वविद्यालय से हासिल की। वर्ष 2016 में अपने ही विवि में एलएलएम और पीएचडी की डिग्री हासिल की। यानी 2016 में राजकुमार राणा मानव भारती विवि के एमडी भी थे और इसी विवि में बतौर छात्र पढ़ाई भी कर रहे थे। एलएलएम और पीएचडी की पढ़ाई उन्होंने एक साथ पूरी की।
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उन्हें पढ़ाई पूरी होने पर अपने ही संस्थान की ओर से चरित्र प्रमाणपत्र भी जारी हुआ। इसमें वेरी गुड करेक्टर अंकित किया गया है। राणा को महंगी गाड़ियों का शौक है। विश्वविद्यालय में तैनात अधिकतर स्टाफ की पीएचडी भी वर्ष 2016 के दौरान हुई है। अब पुलिस वर्ष 2016 के उन थिसेस को ढूंढ रही है, जो राजकुमार राणा या उनके स्टाफ के लोगों ने पढ़ाई के दौरान तैयार किए थे।
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फिलहाल, राणा भूमिगत है। पुलिस उनकी तलाश कर रही है। कोर्ट में अग्रिम जमानत पर कोई फैसला न आने से राणा गिरफ्तारी से बचे हुए हैं। पुलिस अधीक्षक अभिषेक यादव ने कहा कि पुलिस 13 मार्च का इंतजार करेगी। याचिका पर फिलहाल कोई फैसला नहीं आया है। मामले में जल्द गिरफ्तारी होगी। 

ऐसे होता था डिग्रियों का फर्जीवाड़ा

Fake degree case: Rajkumar Rana was both an MD and a student in his own institute
राजस्थान से बरामद प्रमाणपत्र - फोटो : अमर उजाला

मानव भारती विवि में डिग्री हासिल करने के लिए आवेदन करने वालों को न नहीं कहा जाता था। डिग्री के एवज में उनसे मोटी रकम ली जाती थी। न सिर्फ विवि, बल्कि उनसे संबद्धता प्राप्त संस्थान भी डिग्री जारी कर देते थे। डिग्री के बाद छात्रों को प्रमाण जारी किया जाता था। हिदायत दी जाती थी कि छात्रों को डिग्री सत्यापित करने के लिए विवि कैंपस जाना होगा। जैसे ही छात्र विवि कैंपस पहुंचते थे, रिसेप्शन पर उनसे तीन हजार रुपये की फीस ली जाती थी।

इसके एवज में रसीद जारी नहीं होती थी। इस फीस के बाद डिग्री को सत्यापित कर दिया जाता था। कोई भी छात्र जब इस डिग्री के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन करता था तो दोबारा डिग्री सत्यापित करने को कहा जाता था। कैंपस में फिर तीन हजार की वसूली पर डिग्री सत्यापित हो जाती थी। मनोविज्ञान में एमए करने वाली हरियाणा की पीड़ित के मामले में जब सरकारी तौर पर डिग्री को सत्यापित करने के लिए भेजा तो विवि इससे मुकर गया। विवि प्रबंधन ने खुद ही इसे फर्जी करार दे दिया। 

युवाओं की नौकरियों पर संकट
मानव भारती विवि से लाखों डिग्रियां जारी होने का खुलासा हुआ है। इनके आधार पर कई युवा नौकरी भी कर रहे हैं। जांच का दायरा बढ़ने के बाद उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। सरकारी तौर पर की गई पड़ताल में मानव भारती की डिग्री फर्जी होने का खुलासा हुआ है। कई युवा इन डिग्रियों के आधार पर निजी संस्थानों में भी नौकरी कर रहे हैं। उनके लिए भी फर्जीवाड़ा खतरे की घंटी बजा रहा है।

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