चुनावी मुद्दाः सेब राज्य के बागवानों को दिखाए सिर्फ सियासी सब्जबाग
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सेब राज्य के नाम से मशहूर हिमाचल में बागवानों को राजनेताओं ने कई सब्जबाग दिखाए लेकिन धरातल पर स्थिति कुछ और ही है। सियासी दलों के वायदों पर सालों बाद भी कोई अमल नहीं हो रहा है। हर चुनावी सीजन में वोटों की फसल बटोरने के लिए सियासतदां फिर वायदों का पिटारा लेकर पहुंच जाते हैं।
दशकों से यह क्रम जारी है लेकिन बागवानों की विदेशी सेब पर रोक लगाने की मांग आज तक पूरी नहीं हो सकी है। कांग्रेस हो या भाजपा कोई भी सरकार सूबे के सेब को अच्छा दाम दिलाने के लिए न तो विदेशी सेब पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ा सकी है और न ही कोल्ड ड्रिंक में सेब जूस को शामिल करने जैसी घोषणाएं धरातल पर उतर सकी हैं।
अमेरिका, चीन समेत 40 देशों की चुनौती
देश में विदेशों से बड़े पैमाने पर सेब का आयात होता है। स्थानीय सेब को अमेरिका, चीन समेत 40 से ज्यादा देशों के सेब की चुनौती मिल रही है। अफगानिस्तान, श्रीलंका जैसे सार्क देशों के रास्ते भी सेब भारत पहुंच रहा है। सार्क देशों के साथ व्यापार उत्पाद शुल्क मुक्त है। जबकि अन्य देशों के लिए वर्तमान में लगभग 50 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी के बावजूद भारी मात्रा में सेब भारत आ रहा है। इस 50 फीसदी उत्पाद शुल्क को उल्टा घटाकर शून्य पर लाने की तैयारी चल रही है। डब्ल्यूटीओ की दोहा राउंड की चल रही वार्ता में अगर हिमाचल प्रदेश समेत अन्य राज्यों के भारतीय सेब को विशेष श्रेणी का उत्पाद घोषित किया जाता है तो ये उत्पाद शुल्क 50 फीसदी से नीचे नहीं आ सकता है।
चुनाव के दौरान ही होते हैं वादे
चुनावों के दौरान बागवानों को साधने के लिए सेब को मैनिफेस्टो में जगह दी जाती है, लेकिन बाद में सुध नहीं ली जाती। तत्कालीन केंद्रीय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने तो पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान आयात शुल्क बढ़वाने का मामला कांग्रेस घोषणापत्र में शामिल किया था, मगर इस पर अमल नहीं हो पाया। कुछ माह पहले शिमला में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सेब के जूस को कोल्ड ड्रिंक में मिलाने की बात कही थी। लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई प्रयास नहीं हो पाए हैं।
85 फीसदी क्षेत्र में नहीं है सिंचाई सुविधा
हिमाचल में केवल 15 फीसदी क्षेत्र ही सिंचित है। यानी 85 प्रतिशत क्षेत्र ऐसा है जिसमें बगैर सिंचाई प्रबंध के ही सेब बागवानी की जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर उपज विदेशों की तुलना में बहुत कम है। प्रदेश का प्रति हेक्टेयर सेब उत्पादन सात से 10 लाख मीट्रिक टन है। विदेशों में ये 25 से 60 लाख मीट्रिक टन है। सेब बागवानों को सस्ती दरों पर कार्टन उपलब्ध करवाने से लेकर कई अन्य मुद्दों पर भी सरकारों ने काम नहीं किया है।
3000 करोड़ का है सालाना कारोबार
प्रदेश में बागवानी के तहत करीब ढाई लाख हेक्टेयर क्षेत्र आता है। सेब बागवानी के अंतर्गत करीब डेढ़ लाख हेक्टेयर रकबा है। सेब का करीब 3000 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार होता है। सिंचाई और अन्य सुविधाएं हों तो इसे बढ़ाकर दोगुने से तिगुना किया जा सकता है। राज्य में कुल फल उत्पादन 10 लाख मीट्रिक टन होता है। सेब उत्पादन लगभग आठ लाख मीट्रिक टन के आसपास रहता है। सेब बागवानी से एक लाख बागवान परिवार जुड़े हैं। सेब बागवानी ने राज्य के युवाओं को बड़ी संख्या में रोजगार भी दिया है। उन्हें निजी व सरकारी नौकरी की भी जरूरत नहीं। इसके बावजूद सरकारें सेब बागवानों को जरूरी सहूलियतें नहीं दे पाई हैं।
सेब उत्पादन से जुड़े हैं 1 लाख परिवार
-हिमाचल में कितना सालाना सेब कारोबार : लगभग 3000 करोड़ रुपये
-कितना सालाना सेब उत्पादन : 8 लाख मीट्रिक टन
-सेब बागवानी से जुडे़ परिवारों की संख्या : करीब 1 लाख
-सेब बागवानी के तहत कितना फीसदी क्षेत्र सिंचित : लगभग 15 फीसदी
-प्रदेश में सेब का प्रति हेक्टेयर उत्पादन : 7 से 10 मीट्रिक टन
-विदेशों में सेब की प्रति हेक्टेयर पैदावार : 25 से 60 मीट्रिक टन तक
-भारत की मंडियों में कितने देशों से हो रहा सेब का आयात : 40 से ज्यादा
-विदेशी सेब पर कितना है उत्पाद शुल्क : 50 फीसदी
सेब की कहानी, बागवानों की जुबानी
अगर विदेशों में किए जाने वाले सेब उत्पादन से हिमाचल की तुलना करें तो हम अभी कहीं नहीं ठहरते हैं। हिमाचल में सेब की पैदावार बहुत कम होती है। विदेशों में सिंचाई के साधन हैं। अन्य सभी सुविधाएं हैं। इसके अलावा पत्ती परीक्षण, मृदा परीक्षण आदि अपेक्षित स्तर पर हो ही नहीं पाऐ। यहां तो दवाएं भी पूरी नहीं मिल पातीं हैं। सरकार 1100 करोड़ रुपये की बागवानी विकास परियोजना तो जरूर लाई मगर ये भी धरातल पर लागू नहीं हो पाई। व्यवस्था बागवानों का सहयोग नहीं कर पा रही है। -डिंपल पांजटा, युवा बागवान, रोहडू
प्रदेश में बागवानों को अपने अधिकार के लिए खुद जागरूक होना होगा। सरकारों से वह सब तरीके से मांगना होगा, जो उनसे अपेक्षित है। पिछले कुछ दशकों की बात करें तो नई किस्में आई हैं। इसमें कुछ योगदान सरकारों का भी रहा है। ये किसानों-बागवानों पर निर्भर करता है कि वे कैसे फसल ले रहे हैं और फसल लेने की कैसी तैयारी कर रहे हैं। मौसम की भी सेब पैदावार पर बड़ी मार पड़ी है। बागवानों की दृष्टि से देखा जाए तो कई योजनाएं सिंचाई की भी आई हैं। कृषि उपकरणों पर भी सब्सिडी दी जा रही है। इसके बावजूद बागवानों को अपनी मेहनत से ही बागवानी का कायाकल्प करना होगा। -सुरेंद्र लालटा, बागवान, कोटखाई
मामले पर क्या कहता है सतापक्ष और विप
सेब के आयात पर 50 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी वाजपेयी जी ने लगाई थी, न कि किसी कांग्रेसी ने। देश में कांग्रेस का राज रहा और वे इसे नहीं लगा सके। एक ही बात कहते रहे कि हमारी अंतरराष्ट्रीय संधि है। बागवानी के लिए सबसे ज्यादा संजीदगी पीएम नरेंद्र मोदी ने दिखाई। ड्रिप इरिगेशन के तहत प्रधान कृषि सिंचाई योजना में प्रोजेक्ट मांगे गए। इस सरकार ने बागवानों का एक भी प्रोजेक्ट नहीं भेजा। कोल्ड ड्रिंक में फ लों के जूस को कंपल्सरी करने के लिए शोध करे जा रहे हैं। जैसे ही कंपल्सरी हो जाता है तो ये अच्छा होगा। बागवानी क्षेत्रों के लिए एनएच की घोषणा की गई। एक भी डीपीआर नहीं भेजी गई। कांग्रेस ने वायरस से युक्त पौधे विदेशों से मंगवाए हैं। बीजेपी सरकार ने एंटी हेलगन का प्रयोग किया। इन्होंने नहीं लगाया। केवल इसलिए कि इसका क्रेडिट भाजपा को जाता है। कांग्रेस सरकार बागवान विरोधी है। -डा. राजीव बिंदल,मुख्य प्रवक्ता, भाजपा
हमारी सरकार ने 1100 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट लाकर सबसे बड़ी उपलब्धि अर्जित की है। ये प्रदेश सरकार में बागवानी का कायाकल्प करेेगी। इससे हिमाचल तेजी से आगे बढ़ेगा। कांग्रेस सरकार ने बागवानी को एक उद्योग माना है। चाहे सेब के प्लांट हों या कुछ और। हमने समर्थन मूल्य भी बढ़ाए हैं। जगह-जगह पर मंडियां खोली गई हैं। आयात शुल्क की सीमा हमारे वक्त में अधिकतम रही। पीएम नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे पर हिमाचल में बड़े वादे किए थे, मगर इन पर गौर नहीं हुआ। हिमाचल आकर बाकायदा घोषणा की गई कि कोल्ड ड्रिंक में सेब का जूस मिलाया जाएगा, मगर इसमेें कोई खास प्रगति नहीं हुई। -नरेश चौहान, प्रदेश महासचिव, कांग्रेस पार्टी