धरती का स्वर्ग हिमाचल: जिंदगी की भागमभाग में सुकून के पल देती हैं देवभूमि की हसीन वादियां
प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण यह क्षेत्र छुट्टियां मनाने के लिए सैलानियों की उम्दा पसंद है। हिमाचल प्रदेश में हर साल लाखों देसी-विदेशी सैलानी यहां की नैसर्गिक सुंदरता को निहारने के लिए पहुंचते हैं। शुद्ध आबोहवा और प्राकृतिक नजारों से भरपूर हिमाचल की वादियां पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।
विस्तार
पश्चिमी हिमालय की गोद में बसा हिमाचल प्रदेश पहाड़ों और नदियों से घिरा हुआ राज्य है। रावी, चिनाब, ब्यास, यमुना और सतलुज जैसी बड़ी नदियों का हिमाचल मूल क्षेत्र है। प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण यह क्षेत्र छुट्टियां मनाने के लिए सैलानियों की उम्दा पसंद है। हिमाचल प्रदेश में हर साल लाखों देसी-विदेशी सैलानी यहां की नैसर्गिक सुंदरता को निहारने के लिए पहुंचते हैं। शुद्ध आबोहवा और प्राकृतिक नजारों से भरपूर हिमाचल की वादियां पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। प्रदेश में घूमने के लिए कई बेहतरीन स्थान हैं। साहसिक गतिविधियों के शौकीनों के लिए भी यहां अच्छे स्थल है। यहां पर रिवर राफ्टिंग, ट्रैकिंग, वॉटर स्पोर्ट्स और पैराग्लाइडिंग का आनंद ले सकते हैं। हिमाचल को देवभूमि भी कहा जाता है। यहां धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से कई दर्शनीय स्थल हैं। साथ ही कई ऐतिहासिक धरोहर भी हैं। सैलानी हैरिटेज टूरिज्म के लिए शिमला, साहसिक पर्यटनके लिए मनाली और आध्यात्मिक टूरिज्म के लिए धर्मशाला का रुख करते हैं। किन्नौर और लाहौल स्पीति भी देसी विदेशी सैलानियों की पसंदीदा सैरगाह है।
हिमाचल प्रदेश में पर्यटन तेजी से बढ़ रहे उद्योगों में से एक है। इस उद्योग से प्रतिवर्ष राज्य की आय में भी भारी इजाफा हो रहा है। प्रदेश की जीडीपी में पर्यटन क्षेत्र का दस फीसदी का योगदान है। राज्य के पर्यटन उद्योग में आए तेज उछाल के चलते यहां बीते कुछ वर्षो में होटल और रिजोर्ट निर्माण में वृद्धि हुई है। होमस्टे यूनिटों की भी भरमार है। भौगोलिक दृष्टि से हिमाचल प्रदेश के पूर्व में तिब्बत, पश्चिम में पंजाब और उत्तर में जम्मू- कश्मीर राज्य हैं। यहां की हरियाली, बर्फ से ढकी हुई चोटियां, बर्फीले ग्लेशियर, मनमोहक झीलें आने वाले किसी भी पर्यटक का मन मोह लेने के लिए काफी हैं। हिमाचल में तीन ऋतुएं होती हैं। ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु और वर्षा ऋतुु। हिमाचल प्रदेश की समुद्रतल से ऊंचाई की विविधता के कारण जलवायु में भी भिन्नता है। कहीं बर्फ गिरती है तो कहीं गर्मी होती है। हिमाचल में गर्म पानी के चश्मे भी हैं और हिमनद भी हैं। ब्रिटिशकाल में देश की ग्रीष्मकालीन राजधानी रही हिल्स क्वीन के नाम से मशहूर शिमला की खूबसूरत वादियां देसी के साथ विदेशी पर्यटकों की भी प्रमुख सैरगाह है। शिमला में ऐतिहासिक माल रोड, रिज मैदान, क्राइस्ट चर्च, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, गेयटी थियेटर, राज्य संग्रहालय के अलावा कई ऐतिहासिक इमारतें व दर्शनीय स्थल हैं। वहीं प्रसिद्ध हनुमान मंदिर जाखू, तारादेवी मंदिर, संकटमोचन मंदिर के अलावा कालीबाड़ी मंदिर राजधानी शिमला के प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। हिमाचल में शिमला, कुल्लू और कांगड़ा के लिए हवाई सेवाएं उपलब्ध हैं। शिमला, कांगड़ा, मंडी, ऊना के लिए रेल सेवाएं भी हैं। प्रदेश में सड़कों का जाल अधिकांश क्षेत्रों में फैला है।
पर्यटन विभाग, प्रदेश में पंजीकृत हैं 4192 होटल
पर्यटन विभाग की शुरुआत वर्ष 1955 में भारत सरकार की ओर से शिमला स्थित पर्यटन सूचना केंद्र के हिमाचल सरकार को हस्तांतरित करने के साथ हुई थी। तृतीय पंचवर्षीय योजना के दौरान 1961-62 में पहली बार लोक संपर्क विभाग में पर्यटन विकास के लिए मुख्यालय में एक पर्यटन अनुभाग की स्थापना की गई। जुलाई 1966 में लोक संपर्क विभाग से अलग होकर पर्यटन विभाग एक स्वतंत्र निदेशालय के रूप में कार्य करने लगा। वर्ष 1972 में प्रदेश पर्यटन विकास निगम का गठन किया गया। पर्यटन विभाग और पर्यटन निगम अलग-अलग कर दिए गए। वर्ष 1976 के आरंभ में प्रदेश रजिस्ट्रेशन ऑफ होटल्ज एवं ट्रेवल एजेंट्स अधिनियम लागू किया गया। प्रदेश में पर्यटन उद्योग के रूप में होटल तथा रेस्तरां को भी शामिल किया गया। दिसंबर 1984 में पर्यटन को उद्योग का दर्जा मिला।
प्रदेश में पंजीकृत हैं 4192 होटल, 3451 होम स्टे
वर्तमान में प्रदेश में 4192 होटल/गेस्ट हाउस और 3451 होम स्टे यूनिट पंजीकृत हैं। जून 2022 तक प्रदेश में पंजीकृत ट्रेवल एजेंटों की कुल संख्या 4581 है। वर्ष 1972 में राज्य पर्यटन विकास निगम के 11 होटल थे। वर्तमान में निगम के 54 होटल हैं।
वर्ष 2021 में प्रदेश भर में आए 56.37 लाख सैलानी
हिमाचल प्रदेश के विभिन्न पर्यटन स्थलों पर वर्ष 2021 के दौरान 56, 37,102 सैलानी आए। वर्ष 1990 में 19.42 लाख सैलानी प्रदेश में आए थे। राज्य में विकसित हुए नये पर्यटन स्थलों सहित अन्य सुविधाओं में विस्तार से सैलानियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
विश्व धरोहर कालका-शिमला रेलवे मार्ग आकर्षण का केंद्र
विश्व धरोहर में शामिल 119 साल पुराना ऐतिहासिक कालका-शिमला रेलवे मार्ग भी पर्यटकों के लिए खास आकर्षण है। पारदर्शी विस्ताडोम कोच में सफर कर वादियों को भी निहार सकते हैं। 9 नवंबर 1903 को कालका-शिमला रेलमार्ग की शुरुआत हुई थी। अपने 119 वर्षों के सफर में यह रेल मार्ग कई इतिहास संजोए है। देश विदेश के सैलानी शिमला के लिए इसी रेलमार्ग से टॉय ट्रेन में सफर का लुत्फ उठाते हैं। 1896 में इस रेल मार्ग को बनाने का कार्य दिल्ली-अंबाला कंपनी को सौंपा गया था। रेल मार्ग कालका स्टेशन से शिमला तक जाता है। 96 किलोमीटर लंबे रेल मार्ग पर 18 स्टेशन हैं। कालका-शिमला रेल मार्ग को केएसआर के नाम से भी जाना जाता है। 1921 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी इस मार्ग से यात्रा की थी।
कालका-शिमला रेल लाइन पर 103 सुरंगें सफर को रोमांचक बनाती हैं। बड़ोग रेलवे स्टेशन पर 33 नंबर बड़ोग सुरंग सबसे लंबी है। इसकी लंबाई 1143.61 मीटर है। सुरंग क्रॉस करने में टॉय ट्रेन ढाई मिनट का समय लेती है। रेल मार्ग पर 869 छोटे-बड़े पुल हैं। पूरे रेल मार्ग पर 919 घुमाव आते हैं। तीखे मोड़ों पर ट्रेन 48 डिग्री के कोण पर घूमती है। कालका-शिमला रेल लाइन के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने जुलाई 2008 में इसे वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल किया था। कनोह रेलवे स्टेशन पर ऐतिहासिक आर्च गैलरी पुल 1898 में बना था। आर्च शैली में निर्मित चार मंजिला पुल में 34 मेहराबें हैं।
मुख्य पर्यटन स्थल
चंबा-डलहौजी : चंबा घाटी (915 मीटर) की ऊंचाई पर रावी नदी के दाएं किनारे पर है। पुराने समय में राजशाही का राज्य होने के नाते यह लगभग एक शताब्दी पुराना राज्य है। 6वीं शताब्दी से इसका इतिहास मिलता है। यह अपनी भव्य वास्तुकला और अनेक रोमांचक यात्राओं के लिए एक आधार के तौर पर विख्यात है। पश्चिमी हिमाचल प्रदेश में डलहौजी नामक पर्वतीय स्थान पुरानी दुनिया की चीजों से भरा पड़ा है। यहां राजशाही युग की भव्यता बिखरी पड़ी है। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉड डलहौजी के नाम पर शहर का नाम पड़ा है। बर्फ से ढका धौलाधार पर्वत भी यहां से दिखाई देता है। नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर खजियार सैलानियों को बरबस ही अपनी ओर खींच लेता है।
मनाली
मनाली : समुद्र तल से 6725 फीट ऊपर बसा यह स्थान आपको पहाड़ों के साथ करीब से रूबरू करवाएगा। बर्फ से ढके पहाड़ पर्यटकों को यहां आने पर मजबूर कर देते हैं। लोग यहां बर्फ देखने व बर्फ से जुड़े कुछ रोमांचित खेलों का लुत्फ उठाने आते हैं। सर्दियों का मौसम यहां आने का सबसे अच्छा समय माना जाता है।
कुल्लू : व्यास नदी के तट पर बसा कुल्लू खूबसूरत दर्शनीय स्थल है। यह अटल टनल रोहतांग, रोहतांग पास, ब्यास कुंड व चंद्र ताल झील की भूमि है। यहां का तापमान न अधिक गर्म है और न अधिक ठंडा। सैलानी यहां कभी भी अपनी छुट्टियां बिताने आ सकते हैं।
लाहौल स्पीति : इस जिले को हिमाचल प्रदेश का ठंडा मरुस्थल क्षेत्र कहा जाता है। यहां बर्फ से ढके पहाड़, रंग-बिरंगे मठ और छोटे-छोटे गांव सब कुछ आंखों में भर लेने लायक नजारे की तरह है। साफ नीला आसमान इतना करीब लगता है कि हाथ उठा के छूने का दिल कर जाए।
पैराग्लाइडिंग राजधानी बीड बिलिंग
बीड बिलिंग : इस स्थान को भारत की पैराग्लाइडिंग राजधानी कहा जाता है। इस स्थान ने पिछले कुछ सालों में बहुत लोकप्रियता हासिल की है। ये जगह सिर्फ रोमांचित कार्यों के लिए मशहूर नहीं है, बल्कि यह इको टूरिज्म के लिए भी मशहूर है। यह ऐसा स्थान है जहां स्थानीय यात्रियों से ज्यादा विदेशी यात्री आते हैं।
कांगड़ा : आंतरिक शांति के लिए हर व्यक्ति प्रभु की शरण ढूंढता है। कांगड़ा को देवी-देवताओं की भूमि कहा जाता है। शक्तिपीठों का यह पहाड़ी क्षेत्र धार्मिक और पर्यटन गतिविधियों के साथ ही अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी जाना जाता है। हिमाचल प्रदेश के धार्मिक स्थलों में इस जिले का एक अलग महत्व है। धर्मशाला और पालमपुर जिले के सबसे पसंदीदा शहर है।
मैक्लोडगंज : कांगड़ा का यह क्षेत्र सबसे चर्चित दर्शनीय स्थल है। बहुत से तिब्बतियों के निवास करने के कारण इसे छोटा ल्हासा भी कहा जाता है। ये स्थान धार्मिक स्थल व पर्वतीय स्थल का मिश्रण है। आध्यात्मिकता, हिमालय से रूबरू होने, साहसिक कार्य व खूबसूरत दृश्यों का लुत्फ लेने के लिए लोग यहां आते हैं। यह स्थान बौद्ध श्रद्धालुओं का मुख्य केंद्र है। बौद्धों के 14वें दलाईलामा की कर्मभूमि और निवास स्थान भी यहीं है।
अटल टनल रोहतांग ने विश्व में दिलाई अलग पहचान
आधुनिक तकनीक से तैयार भारत की सबसे महत्वपूर्ण सामरिक महत्व की अटल टनल रोहतांग का नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स की ओर से प्रमाणित किया गया है। समुद्र तल से 10044 फीट की ऊंचाई पर गुजरने वाली अटल टनल को वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने आधिकारिक तौर पर दुनिया की सबसे लंबी यातायात टनल के रूप में प्रमाणित किया है। इस टनल की लंबाई 9.02 किलोमीटर है। टनल को हिमालय की पीर पंजाल की चोटियों को भेदकर करीब 10 साल की अवधि में सीमा सड़क संगठन ने बनाया है। टनल निर्माण की घोषणा तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्ष 2002 में जनजातीय जिला लाहौल स्पीति के मुख्यालय केलांग में की थी। उस दौरान टनल की लागत करीब 1500 करोड़ रुपये आंकी गई थी, लेकिन टनल के निर्माण पर 3600 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। अटल टनल बनने के बाद मनाली से चीन सीमा से सटे लेह की दूरी करीब 45 किलोमीटर घट गई। वहीं इस रूट का सफर कम से कम पांच घंटे कम हो गया है। सर्दी के मौसम में बर्फबारी से बंद होने वाला जनजातीय क्षेत्र लाहौल अब 12 महीने देश-दुनिया से जुड़ गया है।
तीन अक्तूबर 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल टनल रोहतांग का उद्घाटन किया था। इसके बाद से अटल टनल देश और विदेश के पर्यटकों के लिए पहली पसंद बनी है। हिमाचल प्रदेश को अटल टनल ने विश्व में अलग पहचान दिलाई है। यह दुनिया की पहली टनल है जिसमें 4जी कनेक्टिविटी मुहैया करवाई गई है। अटल टनल किसी अजूबे से कम नहीं है। यह टनल अपनी विशेषताओं के लिए खास है। टनल में हर 500 मीटर पर आपातकाल सुरंग है, जो टनल के दोनों छोरों पर निकलती है। हर 150 मीटर पर आपातकाल 4जी फोन की सुविधा है। हर 60 मीटर पर सीसीटीवी हैं। अटल टनल रोहतांग के दोनों छोरों पर पूरी टनल का कंट्रोल रूम है। यहां से हर किसी पर पैनी नजर रखी जाती है। अटल टनल रोहतांग में आपदा की सूरत में एस्केप टनल फंसे हुए लोगों को बाहर निकालेगी। इसे वैकल्पिक तौर पर बनाया गया है। जिसका एक छोर नॉर्थ जबकि दूसरा साउथ पोर्टल में खुलता है। एस्केप टनल में बाकायदा आपात डोर के नीचे दोनों छोरों की दूरी दर्शाने वाले बोर्ड लगाए गए हैं। टनल के ऊपर दो किलोमीटर ऊंचा पहाड़ है।
नये पर्यटन स्थल विकसित करने की जरूरत: मोहिंद्र सेठ
राजधानी शिमला सहित प्रदेश के अधिकांश पर्यटन क्षेत्रों में सैलानियों का ठहराव एक से दो दिन तक घट गया है। इसे बढ़ाने के लिए सरकार को विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है। नये पर्यटन स्थल विकसित करने और उनका व्यापक प्रचार और प्रसार करने से ही प्रदेश में सैलानियों को बुलाया जा सकता है। हिमाचल के मुकाबले पड़ोसी राज्यों जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड, लद्दाख को सैलानी अधिक तवज्जो देने लगे हैं। एयर और रेल कनेक्टिविटी अधिक नहीं होने से कई सैलानी प्रदेश का रुख करने से कतराने लगे हैं। होटल कारोबारियों से कई सैलानी कनेक्टिविटी को लेकर जानकारियां लेते रहते हैं। सड़क मार्ग से सफर अधिक होने के कारण प्रदेश के दूरदराज के क्षेत्रों तक सैलानी पहुंच नहीं पा रहे हैं। सरकार ने हालांकि, कई जगह हेलीपोर्ट तैयार किए हैं, लेकिन हवाई सेवाएं अधिक नहीं होने से इनका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
प्रदेश के मुख्य पर्यटन स्थल शिमला, मनाली, कुल्लू, कसौली, डलहौजी, धर्मशाला में ट्रैफिक जाम की समस्या लगातार गहरा रही है। कुछ दिनों के लिए देवभूमि हिमाचल आने वाले सैलानी तंग सड़कों पर लगने वाले जाम के कारण सहज महसूस नहीं करते हैं। महानगरों की दौड़ भाग वाली जिंदगी से राहत पाने के लिए हिमाचल आने वाले सैलानियों को बेहतर सुविधाएं देने के लिए सरकार को दूरगामी योजना बनाते हुए टूरिज्म विजन तैयार करने की दिशा में काम करना चाहिए। प्रदेश की जीडीपी में पर्यटन क्षेत्र का योगदान दस प्रतिशत तक है। लाखों लोगों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर पर्यटन उद्योग से रोजगार जुड़ा है। प्रदेश के मुख्य शहरों में भीड़भाड़ अधिक होने पर सरकार को अब ऐसे स्थानों के 15 किलोमीटर के दायरे में होटल, बीएंडबी, होम स्टे के पंजीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना चाहिए। ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देना चाहिए। -मोहिंद्र सेठ(अध्यक्ष टूरिज्म इंडस्ट्री स्टेक होल्डर एसोसिएशन)