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Shimla News: लापरवाही से गाड़ी चलाने का आरोपी चालक 12 साल बाद बरी
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ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास कोर्ट ने सुनाया फैसला
गवाहों ने संकरी सड़क और फिसलन को बताया हादसे का कारण
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास कोर्ट नंबर-5 ने लापरवाही से वाहन चलाने के एक पुराने मामले में आरोपी को बरी कर दिया। जज सुस्मिता शर्मा ने आईपीसी की धारा 279, 337 और 338 के आरोपों से आरोपी राजू को क्लीन चिट दी।
मामला 7 दिसंबर 2014 का है। दोपहर करीब तीन बजे सेरी से घराट की ओर जाते समय टिपर नंबर एचपी-63-6579 गैरामोड़ पर लगभग 150 फीट गहरी खाई में जा गिरा। हादसे में शिकायतकर्ता कली राम को गंभीर चोटें आईं, जबकि अन्य चोटें साधारण बताई गईं। पुलिस ने थाना बालूगंज में चालक राजू के खिलाफ लापरवाही से वाहन चलाने का केस दर्ज किया था।
शिकायतकर्ता कली राम ने अदालत में कहा कि पुलिस ने उसका बयान पढ़कर नहीं सुनाया और वह यह नहीं जानता कि दुर्घटना किसकी गलती से हुई। गवाह दलीप कुमार ने बयान दिया कि सड़क संकरी, अंधा मोड़ और ढलान वाली थी तथा दुर्घटना फिसलन के कारण हुई, न कि तेज रफ्तार या लापरवाही से। एक अन्य गवाह निर्मला चौहान ने कहा कि वह घटना के बाद मौके पर पहुंची थीं। उनके अनुसार वर्ष 2014 में सड़क की हालत खराब थी, हालांकि अब स्थिति बेहतर है। जांच अधिकारी एचसी मदन सिंह ने भी माना कि मौके पर स्वतंत्र गवाह नहीं जोड़े गए।
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अदालत ने कहा कि अभियोजन रैश/नेग्लिजेंट ड्राइविंग साबित करने में असफल रहा। ऐसा कोई स्पष्ट सबूत सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने जानबूझकर खतरा पैदा किया या जोखिम को नजरअंदाज किया। अदालत के अनुसार दुर्घटना का कारण संकरी सड़क, अंधा मोड़, ढलान और फिसलन रहा, न कि चालक की लापरवाही।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एसएल गोस्वामी बनाम स्टेट ऑफ एमपी के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन पर आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने का पूरा बोझ होता है। साथ ही हिमाचल उच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा गया कि केवल रैश ड्राइविंग कहना पर्याप्त नहीं, इसे ठोस साक्ष्यों से साबित करना जरूरी है। इन परिस्थितियों में अभियोजन का केस कमजोर पाया गया और आरोपी को बरी कर दिया गया। अदालत ने अपील न होने की स्थिति में जमानत बॉन्ड डिस्चार्ज करने तथा केस प्रॉपर्टी को तीन महीने बाद नष्ट करने के आदेश भी दिए।
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गवाहों ने संकरी सड़क और फिसलन को बताया हादसे का कारण
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास कोर्ट नंबर-5 ने लापरवाही से वाहन चलाने के एक पुराने मामले में आरोपी को बरी कर दिया। जज सुस्मिता शर्मा ने आईपीसी की धारा 279, 337 और 338 के आरोपों से आरोपी राजू को क्लीन चिट दी।
मामला 7 दिसंबर 2014 का है। दोपहर करीब तीन बजे सेरी से घराट की ओर जाते समय टिपर नंबर एचपी-63-6579 गैरामोड़ पर लगभग 150 फीट गहरी खाई में जा गिरा। हादसे में शिकायतकर्ता कली राम को गंभीर चोटें आईं, जबकि अन्य चोटें साधारण बताई गईं। पुलिस ने थाना बालूगंज में चालक राजू के खिलाफ लापरवाही से वाहन चलाने का केस दर्ज किया था।
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शिकायतकर्ता कली राम ने अदालत में कहा कि पुलिस ने उसका बयान पढ़कर नहीं सुनाया और वह यह नहीं जानता कि दुर्घटना किसकी गलती से हुई। गवाह दलीप कुमार ने बयान दिया कि सड़क संकरी, अंधा मोड़ और ढलान वाली थी तथा दुर्घटना फिसलन के कारण हुई, न कि तेज रफ्तार या लापरवाही से। एक अन्य गवाह निर्मला चौहान ने कहा कि वह घटना के बाद मौके पर पहुंची थीं। उनके अनुसार वर्ष 2014 में सड़क की हालत खराब थी, हालांकि अब स्थिति बेहतर है। जांच अधिकारी एचसी मदन सिंह ने भी माना कि मौके पर स्वतंत्र गवाह नहीं जोड़े गए।
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अदालत ने कहा कि अभियोजन रैश/नेग्लिजेंट ड्राइविंग साबित करने में असफल रहा। ऐसा कोई स्पष्ट सबूत सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने जानबूझकर खतरा पैदा किया या जोखिम को नजरअंदाज किया। अदालत के अनुसार दुर्घटना का कारण संकरी सड़क, अंधा मोड़, ढलान और फिसलन रहा, न कि चालक की लापरवाही।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एसएल गोस्वामी बनाम स्टेट ऑफ एमपी के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन पर आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने का पूरा बोझ होता है। साथ ही हिमाचल उच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा गया कि केवल रैश ड्राइविंग कहना पर्याप्त नहीं, इसे ठोस साक्ष्यों से साबित करना जरूरी है। इन परिस्थितियों में अभियोजन का केस कमजोर पाया गया और आरोपी को बरी कर दिया गया। अदालत ने अपील न होने की स्थिति में जमानत बॉन्ड डिस्चार्ज करने तथा केस प्रॉपर्टी को तीन महीने बाद नष्ट करने के आदेश भी दिए।