कौन संभालेगा दलाईलामा की पदवी, जल्द होने वाला है फैसला
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तिब्बती धर्मगुरु एवं नोबेल शांति पुरस्कार विजेता 14वें दलाईलामा का पुनरावतार होगा या नहीं और होगा तो कैसे होगा, यह वर्ष 2019 में तय हो जाएगा।
धर्मगुरु दलाईलामा के दूत एवं निर्वासित तिब्बत सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री प्रो. सामदोंग रिंपोंछे ने मेकलोडगंज स्थित अपने निवास में ‘अमर उजाला’ के साथ विशेष बातचीत में यह खुलासा किया।
प्रो. रिंपोंछे ने कहा कि धर्मगुरु दलाईलामा के पुनरावतार को लेकर अभी प्रक्रिया नहीं चल रही है। उन्होंने आशंका जताई कि पंचेन लामा की तरह 14वें दलाईलामा के पुनरावतार के समय भी चीन अड़ंगा डाल सकता है, लेकिन 14वें दलाईलामा ही अपने अगले अवतार को मान्यता देंगे।
तिब्बत मसले पर चीन सरकार और धर्मगुरु दलाईलामा के बीच वार्ता के सवाल पर उन्होंने कहा कि वर्ष 2009 के बाद से कोई संवाद नहीं हुआ है। यह चीन पर निर्भर करता है कि उसे वार्ता को आगे बढ़ाना है या नहीं।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2002 से लेकर 2009 तक दोनों पक्षों में हुईं वार्ताओं का कोई परिणाम नहीं निकला था। उस वक्त धर्मगुरु ने चीन सरकार के समक्ष तिब्बत की स्वायत्तता का प्रस्ताव रखा था, लेकिन चीन सरकार ने इस प्रस्ताव पर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
चीन से नाराजगी मोल लेने को तैयार नहीं कोई देश
तिब्बत में बढ़ते आत्मदाह के मामलों पर प्रो. रिंपोंछे ने कहा कि चीन के अत्याचार चरम पर हैं। पूरी दुनिया चीन के व्यापार के जाल में फंसी है। कोई भी देश चीन को नाराज करने के लिए तैयार नहीं है।
मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी को चीन खास तवज्जो नहीं देता है। यही कारण है कि धर्मगुरु दलाईलामा से मिलने के लिए चीन के लोगों को जोखिम उठाकर मेकलोडगंज आना पड़ता है।
निर्वासित तिब्बत सरकार को एक और झटका
निर्वासित तिब्बत सरकार को एक और बड़ा झटका लगा है। दिल्ली में 26 से 28 अप्रैल तक आयोजित होने वाला ग्लोबल कन्वेंशन ऑन तिब्बत सम्मेलन स्थगित हो गया है। निर्वासित तिब्बत सरकार को यह दूसरा बड़ा झटका लगा है।
इससे पहले दिल्ली में दलाईलामा के भारत में 59 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य पर आयोजित होने वाला थैंक्यू इंडिया नाम का कार्यक्रम भी भारत सरकार के रुख को देखते हुए निर्वासित तिब्बत सरकार ने स्थगित कर दिया गया था जो अब मैकलोडगंज में 31 मार्च को हो रहा है।
तिब्बत पर आयोजित होने वाले वैश्विक सम्मेलन में दुनिया भर के 30 देशों के सांसदों ने मंथन करना था। कार्यक्रम का आयोजन निर्वासित तिब्बत संसद कर रही थी। भारत सरकार की ओर से सांसद शांता कुमार ने भी इस सम्मेलन में भाग लेना था।
सांसद शांता कुमार और निर्वासित तिब्बत संसद के डिप्टी स्पीकर आचार्य येशी ने अमर उजाला से सम्मेलन के स्थगित होने की पुष्टि की है। हालांकि, दोनों नेताओं ने कार्यक्रम स्थगित होने के कारणों का खुलासा नहीं किया है।
दिल्ली में तिब्बत पर यह 7वां विश्व संसदीय सम्मेलन आयोजित होना था। सूत्रों की मानें तो यह कार्यक्रम 24 साल पहले भारत आयोजित हुआ था। वर्ष 2012 में यह कार्यक्रम कनाडा में हुआ था। इसमें 30 देशों के 50 से अधिक सांसदों ने भाग लिया था।
मैक्लोडगंज में ही होगा तिब्बतियों का थैंक्यू इंडिया कार्यक्रम
धर्मगुरु दलाईलामा का विवादित ‘थैंक्यू इंडिया’ कार्यक्रम अब मैक्लोडगंज स्थित मुख्य बौद्ध मंदिर में आयोजित होगा। इस कार्यक्रम का आयोजन पहले दिल्ली में प्रस्तावित था, लेकिन चीन के साथ रिश्तों को बनाए रखने के चलते केंद्र सरकार ने कार्यक्रम को अनुमति नहीं दी थी। केंद्र सरकार ने केंद्र और राज्य सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों को निर्देश जारी किए थे कि तिब्बतियों के कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखें।
निर्देश में लिखा था कि यह चीन का भारत के साथ संबंधों का बेहद संवेदनशील समय है। निर्वासित तिब्बत सरकार 31 मार्च को यह कार्यक्रम दलाईलामा मंदिर में आयोजित करेगी। धर्मगुरु दलाईलामा भी निर्वासित तिब्बत सरकार के कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। निर्वासित तिब्बत सरकार 31 मार्च को धर्मगुरु दलाईलामा के भारत में 60वें वर्ष के शुभारंभ के रूप में मना रही है।
कार्यक्रम के माध्यम से तिब्बत सरकार दलाईलामा के भारत में 59 वर्ष पूरे होने पर भारत का आभार जताएगी। निर्वासित तिब्बत सरकार के प्रधानमंत्री डा. लोबसंग सांग्ये ने कहा कि तिब्बत भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भारत से जुड़ा हुआ है। धर्मगुरु दलाईलामा भारत को अपना गुरु मानते हैं।
वह नालंदा परंपरा के आधार पर भारत के प्राचीन ज्ञान के पुनरुद्धार की वकालत करते रहे हैं। दलाईलामा अहिंसा, अंतर-धार्मिक सद्भाव के भारतीय मूल्यों के लिए सबसे बेहतर राजदूत साबित हो रहे हैं। निर्वासित तिब्बत सरकार और दुनिया भर में रहने वाले तिब्बती वर्ष 2018 को थैंक्यू इंडिया के रूप में मना रहे हैं। तिब्बती लोग उनकी प्राचीन संस्कृति और अद्वितीय पहचान को बढ़ावा देने के लिए भारत के आभारी हैं।