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बदलाव: जलवायु परिवर्तन से बदल रही हिमाचल की सेब बेल्ट, शिमला में गिरावट तो नए क्षेत्रों में बढ़ी पैदावार
Mon, 08 Jun 2026 10:57 AM IST
Ankesh Dogra
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Mon, 08 Jun 2026 10:57 AM IST
सार
हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन के कारण सेब उत्पादन का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। नौणी विश्वविद्यालय के अध्ययन में सामने आया है कि राज्य के पारंपरिक सेब उत्पादक क्षेत्र शिमला में उत्पादन वृद्धि की रफ्तार घट रही है, जबकि सिरमौर, स्पीति और मंडी जैसे नए क्षेत्रों में सेब की पैदावार तेजी से बढ़ रही है। पढ़ें पूरी खबर...
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रेड गोल्डन किस्म के सेब।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन का भूगोल बदल रहा है। एक अध्ययन में सामने आया है कि जहां एक ओर राज्य के पारंपरिक सेब उत्पादक क्षेत्र शिमला में उत्पादन वृद्धि दर में हल्की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं सिरमौर, स्पीति और मंडी जैसे जिलों में सेब उत्पादन तेजी से बढ़ा है। यह अध्ययन डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के सामाजिक विज्ञान विभाग के डॉ. शिल्पा रानी, डॉ. सुभाष शर्मा और डॉ. अनुरिता ने किया है।
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अध्ययन में वर्ष 1974-75 से 2022-23 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। आंकड़ों के अनुसार सिरमौर जिले में सेब उत्पादन की सर्वाधिक वार्षिक वृद्धि दर 27.70 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि स्पीति में 10.30 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। जलवायु परिवर्तन और अनुकूल किस्मों के इस्तेमाल ने नए क्षेत्रों में सेब उत्पादन को बढ़ावा दिया है। अध्ययन के अनुसार जिन क्षेत्रों में पर्याप्त चिलिंग ऑवर्स उपलब्ध हो रहे हैं, वहां सेब उत्पादन बढ़ रहा है।
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वहीं, राज्य में सबसे अधिक सेब क्षेत्र और उत्पादन वाले शिमला जिले में कुल अवधि के दौरान सेब उत्पादन वृद्धि दर में 3.70 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञों के अनुसार बदलती जलवायु, असमान वर्षा, उत्पादन लागत में वृद्धि और पारंपरिक बगीचों की सीमाएं इसके पीछे प्रमुख कारण हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि राज्य की सेब अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने के लिए उच्च घनत्व पौधारोपण, क्षेत्र विशेष के अनुकूल किस्मों का चयन और आधुनिक बागवानी तकनीकों को अपनाना जरूरी होगा। शोधकर्ताओं ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की बागवानी अर्थव्यवस्था अब पारंपरिक मॉडल से निकलकर जलवायु-अनुकूल और तकनीक आधारित मॉडल की ओर बढ़ रही है।
फूलों के खिलने, फल लगने में देरी भी कारण
विशेषज्ञों के अनुसार फसल उत्पादन में गिरावट के अन्य कारणों में फूलों के खिलने, फल लगने में देरी, बीमारियों का प्रकोप, कीट-पतंगों का हमला, कटाई के बाद फलों के रखरखाव और भंडारण में कमी शामिल हैं। जलवायु परिवर्तन के हानिकारक प्रभावों से सेब के फलों को बचाने के लिए तकनीकी रूप से उन्नत तकनीकों का उपयोग करने की जरूरत जताई गई।
विशेषज्ञों के अनुसार फसल उत्पादन में गिरावट के अन्य कारणों में फूलों के खिलने, फल लगने में देरी, बीमारियों का प्रकोप, कीट-पतंगों का हमला, कटाई के बाद फलों के रखरखाव और भंडारण में कमी शामिल हैं। जलवायु परिवर्तन के हानिकारक प्रभावों से सेब के फलों को बचाने के लिए तकनीकी रूप से उन्नत तकनीकों का उपयोग करने की जरूरत जताई गई।
क्या बताते हैं सेब बागवान : कोटखाई के बखोल गांव के बागवान संजीव चौहान का कहना है कि शिमला में परंपरागत सेब बगीचे पुराने हो गए हैं। सिरमौर में नए क्षेत्रों में सेब के बगीचे लग रहे हैं। कोटगढ़ क्षेत्र के हरि चंद रोच ने कहा कि वह इस अध्ययन से तभी सहमत होंगे, जब यह जानेंगे कि अगर सिरमौर जिला सेब उत्पादन में इतनी उपज दे रहा है तो राजगढ़ बेल्ट पहले फेल क्यों हो गई।
प्रदेश में सेब बागवानी के नए क्षेत्र पनप रहे हैं। उच्च घनत्व वाले पौधरोपण से भी नए क्षेत्रों में उपज बढ़ रही है। शोध पत्र का अध्ययन किया जाएगा। सिरमौर का राजगढ़ व अन्य क्षेत्र बागवानी क्षेत्र में अच्छा काम कर रहे हैं। -डॉ. सतीश शर्मा, निदेशक, बागवानी विभाग