300 साल पुरानी इमारत को हिला नहीं पाया भूकंप
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भले ही 21वीं शताब्दी में भूकंपरोधी भवन बनाने के लिए कई तकनीकें ईजाद की जा रही हों, लेकिन हिमाचल में सदियों पहले ऐसे भवन तैयार हो चुके हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कुल्लू के बंजार की करीब 300 साल पुरानी सात मंजिला चैहणी कोठी। हाल ही में आए भूकंप से भी इस इमारत को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है।
वर्ष 1905 में 7.8 रिक्टर स्केल तीव्रता पर आए भयंकर भूकंप से इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढह गई थीं लेकिन उस समय नौ मंजिला चैहणी कोठी को ये भूकंप भी हिला तक नहीं पाया।
कोठी की आठवीं और नवीं मंजिल में बेशक हल्की दरारें आईं, जिन्हें बाद में गांव की सुरक्षा के मद्देनजर गिरा दिया गया। पहाड़ी पर स्थित करीब 90 फीट ऊंची चैहणी कोठी आज भी शोध का विषय है।
ऐतिहासिक भवन में देवता शृंगा ऋषि का मंदिर स्थापित
उल्लेखनीय है कि 1905 में आए विनाशकारी भूकंप से प्रदेश में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी। देवता शृंगा ऋषि के कारदार राजकुमार का दावा है कि भूकंप की तीव्रता अधिक होने से चैहणी कोठी के आसपास कई मकान ढहकर जमींदोज हो गए थे।
राजकुमार ने दावा किया कि इस ऐतिहासिक कोठी का निर्माण 17वीं शताब्दी में स्थानीय राजा ढाडू ने करवाया था। कोठी के कुछ दस्तावेज मिले हैं, लेकिन ये टांकरी में हैं।
इसी वजह से अभी तक इनका अनुवाद नहीं हो पाया है। दस्तावेजों के अनुवाद बाद ही कोठी से संबंधित पुराना इतिहास जगजाहिर हो पाएगा।
देवता शृंगा ऋषि के नाम है कोठी
चैहणी कोठी अब क्षेत्र के आराध्य देवता शृंगा ऋषि के नाम पर है। दावा किया जाता है कि सैकड़ों साल पुरानी काष्ठकुणी शैली की निर्मित इस कोठी में जोगनियां वास करती हैं। शृंगा ऋषि के कारदार राजकुमार कहते हैं कि कोठी की देखभाल देवता के सभी कारकून करते हैं।
ये है खासियत
जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर कहते हैं कि कुल्लू में ग्रामीण इलाकों के मकान और करीब 500 मंदिर काष्ठकुणी शैली से बनाए गए हैं। काष्ठकुणी शैली में लकड़ी व पत्थर का अनुपात 60:40 होता है। मकान और मंदिर के हर कोने को लकड़ी के जोड़ से तैयार किया जाता है।